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इज़राइल-लेबनान में बड़ी कूटनीतिक पहल, अब होंगे सीधे बातचीत के दौर, क्या खत्म होगा टकराव?
वॉशिंगटन में “सकारात्मक” बैठक के बाद दोनों देश आमने-सामने वार्ता पर सहमत, अमेरिका ने जताया समर्थन
मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव के बीच एक अहम कूटनीतिक कदम सामने आया है। Israel और Lebanon अब सीधे बातचीत (Direct Negotiations) के लिए तैयार हो गए हैं। यह फैसला वॉशिंगटन में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद लिया गया, जिसे अमेरिका ने “प्रोडक्टिव” यानी सकारात्मक करार दिया है।
अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता Tommy Pigott ने जानकारी दी कि दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत काफी सार्थक रही। उन्होंने कहा कि सभी पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि जल्द ही एक तय समय और स्थान पर सीधी वार्ता शुरू की जाएगी।
अमेरिका की मध्यस्थता से बनी राह
इस पूरी प्रक्रिया में अमेरिका की भूमिका बेहद अहम रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio की मध्यस्थता में इज़राइल और लेबनान के दूतों के बीच करीब दो घंटे तक गहन चर्चा हुई।
अमेरिका ने इस समझौते को “ऐतिहासिक कदम” बताया है और आगे की बातचीत के लिए पूरा समर्थन देने की बात कही है। साथ ही, अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी तरह का युद्धविराम या समझौता केवल दोनों देशों की सरकारों के बीच ही होना चाहिए, किसी तीसरे चैनल के जरिए नहीं।
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संघर्ष की पृष्ठभूमि क्या है?
यह पहल ऐसे समय में आई है जब क्षेत्र में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। 2 मार्च को Hezbollah द्वारा इज़राइल पर हमले के बाद लेबनान भी इस क्षेत्रीय संघर्ष में खिंच गया।
इसके बाद से इज़राइल की जवाबी कार्रवाई में भारी तबाही देखने को मिली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक 2,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हो गए हैं।
इज़राइली सेना ने दक्षिण लेबनान में जमीनी कार्रवाई भी शुरू कर दी थी, जिससे हालात और बिगड़ गए। हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार युद्धविराम की अपील करता रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया था।

क्या अब मिलेगा शांति का रास्ता?
विशेषज्ञ मानते हैं कि सीधे बातचीत की शुरुआत इस पूरे संकट को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम हो सकती है। अगर दोनों देश खुले तौर पर अपने मतभेदों पर चर्चा करते हैं, तो भविष्य में स्थायी समाधान निकलने की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि, यह भी साफ है कि रास्ता आसान नहीं होगा। दोनों देशों के बीच वर्षों पुराना अविश्वास और क्षेत्रीय राजनीति इस प्रक्रिया को जटिल बना सकते हैं।
फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि यह बातचीत कब और कहां शुरू होगी और क्या यह पहल वास्तव में शांति की ओर ले जा पाएगी या नहीं।
