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Hormuz Strait पर बढ़ा युद्ध का खतरा! जुलाई तक रास्ता नहीं खुला तो सेना भेज सकता है NATO
तेल सप्लाई रुकने से दुनियाभर में बढ़ी चिंता, NATO देशों के बीच सैन्य तैनाती पर तेज हुई चर्चा
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब वैश्विक स्तर पर नई चिंता पैदा कर रहा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल Hormuz Strait को लेकर अब NATO देशों के बीच बड़ी सैन्य चर्चा शुरू हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर जुलाई की शुरुआत तक यह समुद्री रास्ता नहीं खुला, तो NATO जहाजों की सुरक्षा के लिए अपने सैनिक तैनात करने पर विचार कर सकता है।
बताया जा रहा है कि North Atlantic Treaty Organisation (NATO) के कई सदस्य देश इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि अभी तक इस फैसले को लागू करने के लिए सभी सदस्य देशों की एकमत सहमति नहीं मिल पाई है। जुलाई 7 और 8 को तुर्किये की राजधानी अंकारा में होने वाली बैठक में इस मुद्दे पर अहम चर्चा हो सकती है।
दरअसल, Hormuz Strait दुनिया के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग माना जाता है। वैश्विक तेल और Liquefied Natural Gas (LNG) सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल व्यापार इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर करता है।
फरवरी के आखिर में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमले शुरू होने के बाद ईरान ने इस जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर दिया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला। कई देशों की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ने लगा है।
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अब तक NATO देशों का रुख यह था कि वे तभी हस्तक्षेप करेंगे जब युद्ध पूरी तरह रुक जाएगा और एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन तैयार हो जाएगा, जिसमें गैर-NATO देश भी शामिल हों। लेकिन लगातार बढ़ते आर्थिक दबाव और ऊर्जा संकट ने अब इस रणनीति को बदलने पर मजबूर कर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर Hormuz Strait लंबे समय तक बंद रहा तो इसका सीधा असर एशिया और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। भारत, चीन, जापान और यूरोप के कई देश मिडिल ईस्ट से आने वाले तेल पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में समुद्री व्यापार बाधित होने से ईंधन की कीमतें और महंगाई दोनों बढ़ सकती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगर NATO ने वास्तव में सैन्य तैनाती का फैसला लिया तो इससे मिडिल ईस्ट का तनाव और बढ़ सकता है। ईरान पहले ही अमेरिका और इजरायल के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है। ऐसे में विदेशी सैन्य मौजूदगी हालात को और संवेदनशील बना सकती है।
दुनिया की नजर अब जुलाई में होने वाली NATO बैठक पर टिकी है। यह फैसला केवल मिडिल ईस्ट ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार की दिशा भी तय कर सकता है।
