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ईरान युद्ध के बीच भारत के पास कितना तेल बचा है? Hormuz Strait संकट ने बढ़ाई चिंता

मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल, खाड़ी देशों से आने वाले तेल पर अब भी भारी निर्भरता

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Hormuz Strait संकट और ईरान युद्ध के बीच भारत की तेल सुरक्षा पर बढ़ी चिंता।

ईरान और पश्चिमी देशों के बीच जारी तनाव अब केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रह गया है। इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था और खासकर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पिछले 80 दिनों से जारी संघर्ष और Hormuz Strait में बने संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के समय भारत के पास लगभग 74 दिनों का तेल भंडार मौजूद था। हालांकि 74 दिन पूरे होने के बाद भी देश के पास करीब 60 दिनों का तेल रिजर्व बचा हुआ बताया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति फिलहाल नियंत्रण में जरूर है, लेकिन अगर संकट लंबा चला तो चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। आंकड़ों के अनुसार, देश को हर दिन करीब 50 लाख बैरल तेल की जरूरत होती है। इसमें से लगभग आधा तेल खाड़ी देशों से आता है। Iraq, Saudi Arabia, UAE, Kuwait और Qatar भारत के प्रमुख तेल सप्लायर माने जाते हैं।

सबसे बड़ी चिंता Hormuz Strait को लेकर है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार रास्तों में गिना जाता है। खाड़ी देशों से आने वाला अधिकांश तेल इसी रास्ते से गुजरता है। मौजूदा तनाव और नौसैनिक नाकेबंदी के कारण यह मार्ग अब वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।

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विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर Hormuz Strait लंबे समय तक बाधित रहा तो भारत को वैकल्पिक सप्लाई चैन पर ज्यादा निर्भर होना पड़ सकता है। हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रूस से तेल आयात बढ़ाकर अपनी रणनीति मजबूत की है। वित्त वर्ष 2025-26 में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बनकर उभरा और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से ज्यादा रही।

ऊर्जा मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत इस संकट से निपटने के लिए कई स्तरों पर तैयारी कर रहा है। देश के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) को मजबूत किया गया है ताकि आपात स्थिति में तेल की सप्लाई जारी रखी जा सके। इसके अलावा सरकार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और नए आयात मार्गों पर भी लगातार काम कर रही है।

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हालांकि बाजार में अनिश्चितता अब भी बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अगर मिडिल ईस्ट में हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर भी पड़ सकता है।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए यह सिर्फ तेल का मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का सवाल भी है। ऐसे समय में भारत को अपनी ऊर्जा नीति और अंतरराष्ट्रीय रणनीति दोनों को बेहद संतुलित तरीके से आगे बढ़ाना होगा।

दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि ईरान संकट आगे किस दिशा में बढ़ता है और Hormuz Strait दोबारा पूरी तरह सामान्य कब होता है। क्योंकि इसका सीधा असर भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है।

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