Politics
SIR मामले में Supreme Court के फैसले पर भड़के Yogendra Yadav , बोले- “सब पहले से तय था”
SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने उठाए सवाल, चुनाव आयोग की भूमिका पर भी जताई चिंता।
- स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश की राजनीति और कानूनी हलकों में नई बहस छिड़ गई है। सामाजिक कार्यकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने अदालत के फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें पहले से अंदाजा था कि इस मामले का परिणाम क्या होने वाला है, इसलिए वे अंतिम सुनवाई में अदालत नहीं गए।
योगेंद्र यादव ने कहा कि तीन दिनों तक हुई बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की संवैधानिकता पर गंभीर चर्चा करने के बजाय इसे केवल शिकायत निवारण तक सीमित कर दिया। उनके मुताबिक अदालत का रवैया ऐसा था मानो वह किसी संवैधानिक मुद्दे की जगह उपभोक्ता विवाद सुलझा रही हो।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग को बिहार चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति देकर अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से SIR प्रक्रिया को वैधता दे दी। यादव के अनुसार, जब तक अदालत अंतिम फैसला सुनाती, तब तक चुनाव आयोग कई चरणों में SIR लागू कर चुका था और मामला “fait accompli” यानी पहले से पूरा हो चुका तथ्य बन गया था।
योगेंद्र यादव ने यह भी दावा किया कि अदालत की कुछ टिप्पणियों से ऐसा लगा मानो वोटर सूची से नाम हटने को ज्यादा गंभीर नहीं माना जा रहा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में वोट देने का अधिकार बेहद अहम है और यदि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटते हैं, तो यह संवैधानिक जिम्मेदारी का सवाल बन जाता है।
और भी पढ़ें : Idli-Chutney पर सुलझेगा Karnataka का सियासी संकट? Siddaramaiah ने Shivakumar को बुलाया नाश्ते पर CM की कुर्सी पर सबकी नज़र
वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की टाइमिंग पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में चुनाव होने के बाद फैसला आना चिंता का विषय है। भूषण ने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं थी और इसमें बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने का अधिकार है और यह प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है।
इस फैसले के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच बहस और तेज हो गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा चुनावी राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकता है।
