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परमाणु ठिकाना या खाली गोदाम? IAEA को नहीं पता ईरान की नई भूमिगत सुविधा में क्या है
संयुक्त राष्ट्र का परमाणु निगरानी दल इस्फ़हान की भूमिगत सुविधा तक पहुँचने में अब तक नाकाम — 440 किलो यूरेनियम का पता नहीं, 10 परमाणु बम बनाने के लिए काफी है यह मात्रा
नई दिल्ली/वियना। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका और इज़राइल ने लाखों करोड़ के हथियारों से ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए। राष्ट्रपति ट्रंप ने छाती ठोककर कहा — “ईरान का परमाणु कार्यक्रम तबाह हो गया।” लेकिन संयुक्त राष्ट्र का परमाणु निगरानी संगठन — IAEA — आज भी एक बुनियादी सवाल का जवाब नहीं दे पा रहा: ईरान के इस्फ़हान में जो नई भूमिगत सुविधा है, वह एक सक्रिय परमाणु ठिकाना है या महज एक खाली हॉल?
यह कोई छोटा सवाल नहीं है। इसका जवाब दुनिया की शांति और युद्ध के बीच की रेखा तय कर सकता है।
IAEA प्रमुख की बेबाक स्वीकारोकती
IAEA के महानिदेशक राफेल ग्रोसी ने वाशिंगटन में पत्रकारों के सामने जो बात कही, वह दुनिया को चौंकाने के लिए काफी है। उन्होंने साफ कहा कि IAEA यह नहीं जानता कि इस्फ़हान की नई परमाणु सुविधा “महज एक खाली हॉल है, या सेंट्रीफ्यूज के लिए कंक्रीट प्लेटफॉर्म बन चुका है, या फिर उसमें पहले से ही कुछ सेंट्रीफ्यूज लगाए जा चुके हैं।” यानी जिस संस्था को दुनिया परमाणु हथियारों पर नज़र रखने के लिए जानती है, वह खुद अंधेरे में है।
जरा सोचिए — अगर आपके घर के पास किसी तहखाने में कुछ संदिग्ध हो रहा हो और पुलिस यह कहे कि “हम नहीं जानते अंदर क्या है क्योंकि हमें दरवाज़ा नहीं खुला” — तो आपको कितनी तसल्ली होगी? यही हाल अभी दुनिया का है।
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इस्फ़हान — ईरान का चौथा परमाणु ठिकाना
यह इस्फ़हान सुविधा ईरान का चौथा ज्ञात यूरेनियम संवर्धन संयंत्र बनने वाली थी। ग्रोसी ने बताया कि यह भूमिगत है, लेकिन IAEA के निरीक्षकों ने अभी तक इसका दौरा नहीं किया है। निरीक्षकों की यात्रा तय थी — लेकिन ठीक उसी दिन जब वे जाने वाले थे, अमेरिकी सेना ने इस्फ़हान परमाणु स्थल पर हमला कर दिया और दौरा रद्द हो गया।
440 किलो यूरेनियम — कहाँ है, किसी को नहीं पता
यहाँ सबसे डरावना पहलू यह है। IAEA के पास ईरान के चारों घोषित यूरेनियम संवर्धन केंद्रों तक पहुँच नहीं है, इसलिए वह ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार के मौजूदा आकार, संरचना या स्थान के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकता
IAEA ने अनुमान लगाया है कि ईरान के पास करीब 440 किलोग्राम 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम है। अगर इसे और संवर्धित कर 90 प्रतिशत — यानी हथियार-ग्रेड — तक पहुँचाया जाए, तो यह करीब 10-12 परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त होगा। और यह सब सामग्री इस्फ़हान के भूमिगत सुरंग परिसर में छिपाई गई है — जहाँ IAEA का कोई निरीक्षक नहीं पहुँच सका।
तुलना के लिए समझें — हिरोशिमा पर गिराए गए “लिटिल बॉय” बम में महज 64 किलोग्राम यूरेनियम था। ईरान के पास उससे सात गुना ज्यादा सामग्री है।
ट्रंप का दावा बनाम हकीकत
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार कहते रहे कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम “तबाह” हो गया। लेकिन ग्रोसी ने साफ कहा कि वे इस बात से सहमत नहीं हैं कि सिर्फ सैन्य कार्रवाई से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म किया जा सकता है। उनका तर्क था — यह कार्यक्रम दशकों की मेहनत से बना है, विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं और कई ठिकानों पर फैला है। बम गिराने से इमारतें टूटती हैं, ज्ञान नहीं।

3 मार्च 2026 को IAEA ने पुष्टि की कि हालिया बमबारी नतांज़ परमाणु सुविधा को नष्ट नहीं कर सकी — हालाँकि उसके प्रवेश द्वारों को भारी नुकसान पहुँचा और वे अब बंद हो गए हैं।
बातचीत की मेज़ — लेकिन नतीजा शून्य
ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के तीन दौर हो चुके हैं — लेकिन जिनेवा में हुई तीसरी बैठक भी बिना किसी सफलता के समाप्त हो गई। ईरान के विदेश मंत्री ने हालाँकि एक बड़ी पेशकश की — कि वे संवर्धित यूरेनियम को कम शुद्धता तक “डाउन-ब्लेंड” करने को तैयार हैं। ग्रोसी ने भी कहा कि बातचीत का एक नया ढाँचा तैयार करने की कोशिश होनी चाहिए।
लेकिन जब तक IAEA के निरीक्षक ज़मीन पर नहीं पहुँचते, दुनिया को यह भरोसा कैसे होगा कि ईरान सच बोल रहा है?
आम भारतीय के लिए क्यों मायने रखता है यह?
यह सिर्फ मध्य-पूर्व की कहानी नहीं है। तेल की कीमतें, व्यापारिक रास्ते और वैश्विक सुरक्षा — सब कुछ इस अनिश्चितता से जुड़ा है। जब दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु निगरानी संगठन खुद कह रहा हो कि “हम नहीं जानते” — तो यह सिर्फ ईरान और अमेरिका की समस्या नहीं रहती, यह पूरी दुनिया की चिंता बन जाती है।
