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परदे के पीछे से बड़ा खेल: Mojtaba Khamenei ने कैसे आखिरी पल में अमेरिका-ईरान युद्ध रोका
सार्वजनिक रूप से गायब रहे ईरान के सुप्रीम लीडर, लेकिन गुप्त आदेश ने बदल दी पूरी जंग की दिशा
मध्य पूर्व में चल रहे भीषण तनाव के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई—जो लंबे समय से सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए—ने पर्दे के पीछे रहकर अमेरिका के साथ सीजफायर (युद्धविराम) कराने में अहम भूमिका निभाई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब हालात पूरी तरह युद्ध की ओर बढ़ रहे थे और अमेरिका की तरफ से कड़ा अल्टीमेटम दिया जा चुका था, तभी आखिरी समय में खामेनेई के एक “ग्रीन सिग्नल” ने सब कुछ बदल दिया।
आखिरी 90 मिनट में हुआ बड़ा फैसला
जानकारी के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष एक महीने से ज्यादा समय तक चला। हालात इतने गंभीर हो गए थे कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “पूरी सभ्यता खत्म करने” जैसी कड़ी चेतावनी तक दे दी थी।
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लेकिन इसी तनाव के बीच, डेडलाइन खत्म होने से करीब 90 मिनट पहले अचानक सीजफायर पर सहमति बन गई।
इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा हाथ मोजतबा खामेनेई का बताया जा रहा है, जिन्होंने पहली बार अपने वार्ताकारों को समझौते की दिशा में आगे बढ़ने का निर्देश दिया।
सार्वजनिक रूप से गायब, फिर भी नियंत्रण में
दिलचस्प बात यह है कि मोजतबा खामेनेई लंबे समय से सार्वजनिक मंचों से गायब हैं।
- उनके स्वास्थ्य को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं
- कोई स्पष्ट वीडियो या सार्वजनिक उपस्थिति सामने नहीं आई
- कई रिपोर्ट्स में कहा गया कि वे हमले में घायल हुए थे
इसके बावजूद, सूत्रों का दावा है कि बड़े फैसले अब भी उनके निर्देशों से ही लिए जा रहे हैं।
कैसे हुआ सीजफायर?
रिपोर्ट्स के अनुसार, सीजफायर की प्रक्रिया बेहद गुप्त और जटिल थी:
- बातचीत में पाकिस्तान और चीन जैसे देशों ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई
- संदेश सीधे नहीं बल्कि दूतों और नोट्स के जरिए भेजे गए
- अंतिम मंजूरी मोजतबा खामेनेई से ही मिली
विशेषज्ञों का कहना है कि “अगर उनका इशारा नहीं होता, तो समझौता संभव नहीं था।”

क्या है इस समझौते का असर?
इस दो हफ्तों के अस्थायी युद्धविराम ने दुनिया को थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन खतरा अभी भी टला नहीं है।
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुलने की उम्मीद
- तेल बाजार में अस्थिरता कुछ कम हुई
- लेकिन क्षेत्रीय तनाव अभी भी बना हुआ है
विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थायी शांति नहीं, बल्कि “एक रणनीतिक विराम” है।
आगे क्या?
हालांकि फिलहाल युद्ध रुका हुआ है, लेकिन कई बड़े सवाल अभी भी बाकी हैं:
- क्या ईरान और अमेरिका के बीच स्थायी समझौता होगा?
- खामेनेई की वास्तविक स्थिति क्या है?
- क्या यह शांति टिक पाएगी?
एक बात साफ है—इस पूरे घटनाक्रम ने दिखा दिया कि कभी-कभी सबसे बड़ा फैसला वही व्यक्ति करता है, जो सामने नजर ही नहीं आता।
