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“बीस्ट ऑफ कंधार”: वो अमेरिकी जासूसी ड्रोन जिसे ईरान ने पकड़ा और बदल दी पूरी दुनिया की ड्रोन रणनीति
अमेरिका का सबसे गुप्त स्टील्थ ड्रोन RQ-170 Sentinel — जो ओसामा बिन लादेन के ठिकाने पर भी नज़र रख चुका था — दिसंबर 2011 में ईरान के हाथ लग गया। और उसके बाद जो हुआ, वो आज तक दुनिया की सैन्य रणनीति को प्रभावित कर रहा है।
दिसंबर 2011 की एक ठंडी रात। अफगानिस्तान के आसमान में एक परछाईं की तरह उड़ रहा था एक विमान — न आवाज़, न रोशनी, न कोई निशान। उसका नाम था RQ-170 Sentinel। अमेरिकी सैन्य हलकों में इसे प्यार से कहा जाता था — “बीस्ट ऑफ कंधार”। लेकिन उस रात यह “बीस्ट” अपने बेस कंधार एयरफील्ड पर नहीं लौटा — बल्कि उतर गया ईरान की ज़मीन पर।
कौन था यह “बीस्ट”?
RQ-170 Sentinel को Lockheed Martin की गुप्त Skunk Works लैब में तैयार किया गया था। यह एक अमेरिकी मानव-रहित विमान (UAV) है जिसे USAF, CIA के लिए ऑपरेट करती है। इसकी डिज़ाइन इतनी अनोखी थी कि जब 2009 में कंधार एयरबेस पर इसकी एक धुंधली-सी तस्वीर सामने आई, तो दुनियाभर के रक्षा विशेषज्ञों के होश उड़ गए। उस अजीबोगरीब आकार की वजह से इसके बारे में तरह-तरह की अटकलें फैलने लगीं और यही वो पल था जब इसे “बीस्ट ऑफ कंधार” का खिताब मिला।
यह ड्रोन 50,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए रियल-टाइम इंटेलिजेंस डेटा देने में सक्षम था और इसका करीब 90% हिस्सा कम्पोज़िट सामग्री से बना था — ताकि रडार पर नज़र न आए।
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ओसामा बिन लादेन की मौत में भी था इसका हाथ
इस ड्रोन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी — 2 मई 2011 का वो ऑपरेशन जो इतिहास में दर्ज हो गया। ऑपरेशन नेप्च्यून स्पियर के दौरान, जब अमेरिकी Navy SEALs ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान स्थित ठिकाने पर धावा बोल रहे थे, RQ-170 Sentinel उसके ऊपर मंडरा रहा था और राष्ट्रपति ओबामा Situation Room में इसी ड्रोन का लाइव फीड देख रहे थे। यानी दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी की मौत के वक्त भी यही “बीस्ट” आसमान में था।
वो रात जब “बीस्ट” खुद शिकार बन गया
लेकिन किस्मत को कुछ और मंज़ूर था। 5 दिसंबर 2011 को RQ-170 Sentinel को ईरानी बलों ने उत्तर-पूर्वी ईरान के काशमर शहर के पास पकड़ लिया। ईरान का दावा था कि उसकी साइबर वॉरफेयर यूनिट ने ड्रोन के कंट्रोल को हैक कर लिया और उसे अफगानिस्तान की जगह ईरानी ज़मीन पर उतार लिया।
ड्रोन लगभग सही-सलामत था — बाएं पंख पर थोड़ी-सी खरोंच को छोड़कर कोई बड़ा नुकसान नहीं था। अमेरिका के लिए यह किसी बुरे सपने से कम नहीं था।
अमेरिकी सरकार ने शुरू में यह स्वीकार करने से इनकार किया, लेकिन बाद में राष्ट्रपति ओबामा को मानना पड़ा कि हां, यह अमेरिकी ड्रोन ही था।ओबामा ने ईरान से ड्रोन वापस करने का अनुरोध भी किया — जिस पर ईरान ने राष्ट्रपति को खिलौना ड्रोन भेजकर मखौल उड़ाया।
GPS धोखा — तकनीक की सबसे चालाक चाल
सवाल यह था कि आखिर हुआ कैसे? एक संभावित व्याख्या यह है कि ईरान ने GPS स्पूफिंग अटैक किया — यानी ड्रोन को नकली GPS डेटा भेजा गया जिससे उसे लगा कि वो अपने होम बेस अफगानिस्तान में उतर रहा है, जबकि वो दरअसल ईरान में था।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान को रूस से मिले एक उन्नत जैमिंग सिस्टम “Avtobaza” ने ड्रोन के संचार लिंक को बाधित करने में मदद की होगी।
ईरान ने क्या किया इस “खज़ाने” का?
ईरान ने इस ड्रोन को बस शोकेस में नहीं रखा — उसने इससे सीखा, और एक नई दुनिया बनाई।
RQ-170 के रिवर्स इंजीनियरिंग से ईरान ने Shahed-171 बनाया — जो सीधे इसी की नकल थी। उस प्रोग्राम ने आगे चलकर Shahed-136 लॉइटरिंग म्यूनिशन को जन्म दिया, जो आज दुनिया का सबसे ज़्यादा कॉपी किया जाने वाला अटैक ड्रोन बन चुका है।
ईरान ने यह भी दावा किया कि चीन और रूस दोनों ने इस ड्रोन की तकनीक तक पहुंच के लिए संपर्क किया था। यानी एक ड्रोन की “गिरफ्तारी” ने पूरी दुनिया के ड्रोन उद्योग को नई दिशा दे दी।
2026 में फिर सुर्खियों में
जनवरी 2026 में Lockheed Martin ने पुष्टि की कि RQ-170 ने वेनेज़ुएला में ऑपरेशन Absolute Resolve में भाग लिया, जिसमें निकोलस मादुरो को पकड़ा गया। इतने सालों की चुप्पी के बाद यह ड्रोन एक बार फिर दुनिया के सामने आया — इस बार सीधे Nevada के Creech Air Force Base पर दिन की रोशनी में कैमरे में कैद होकर।
एक ड्रोन, दो दुनियाएं
“बीस्ट ऑफ कंधार” की कहानी सिर्फ एक ड्रोन की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब तकनीक, जासूसी और साइबर युद्ध एक-दूसरे में घुलने लगे। RQ-170 जैसे ड्रोन का $6 मिलियन का अनुमानित खर्च इसे एक सस्ता लेकिन बेहद काम का प्लेटफ़ॉर्म बनाता है।
अमेरिका को जो नुकसान 2011 में हुआ, उसका फल आज यूक्रेन के मैदानों में उड़ने वाले ईरानी ड्रोनों के रूप में दिख रहा है। एक “बीस्ट” पकड़ा गया और उसने दुनिया के ड्रोन युद्ध का नक्शा हमेशा के लिए बदल दिया।
