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60 दिन की डेडलाइन खत्म होने को, फिर भी अमेरिका बोला ईरान से युद्ध नहीं, आखिर क्या चल रहा है पर्दे के पीछे?
तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर, मिडिल ईस्ट में तनाव जारी, लेकिन ट्रंप प्रशासन का दावा—“हम युद्ध में नहीं हैं”
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और वैश्विक बाजारों में हलचल के बीच एक बड़ा सवाल सामने खड़ा है—क्या अमेरिका सच में ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में है? 60 दिन की कानूनी समयसीमा खत्म होने के ठीक पहले, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने साफ शब्दों में कहा है कि “अमेरिका युद्ध में नहीं है।”
यह बयान ऐसे समय में आया है जब हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। फरवरी के अंत में शुरू हुए इस संघर्ष ने न केवल क्षेत्रीय शांति को प्रभावित किया, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी असर डाला है। तेल की कीमतें ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच चुकी हैं और निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है।
अमेरिकी हाउस स्पीकर Mike Johnson ने इस मुद्दे पर कहा कि फिलहाल अमेरिका किसी सक्रिय युद्ध में शामिल नहीं है। उनका कहना है कि “हम कोई बमबारी या सैन्य कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, बल्कि शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।”
क्या है 60 दिन की डेडलाइन?
दरअसल, अमेरिका में एक कानून है जिसे War Powers Act कहा जाता है। इसके तहत राष्ट्रपति अगर बिना कांग्रेस की मंजूरी के सैन्य कार्रवाई करते हैं, तो उन्हें 60 दिनों के भीतर इसकी अनुमति लेनी होती है या फिर कार्रवाई को समाप्त करना पड़ता है।
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जब Donald Trump ने 2 मार्च को कांग्रेस को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान की जानकारी दी, तभी से यह 60 दिन की घड़ी शुरू हो गई थी। अब 1 मई इस समयसीमा का आखिरी दिन है।
लेकिन ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ईरान के साथ जो सीजफायर (युद्धविराम) हुआ है, उसने इस समयसीमा को “पॉज़” कर दिया है। यानी उनके मुताबिक, कानूनी दबाव फिलहाल लागू नहीं होता।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
28 फरवरी को Israel और United States ने मिलकर Tehran समेत कई ईरानी शहरों पर हमला किया। इस हमले में ईरान के शीर्ष नेताओं और सैन्य अधिकारियों की मौत हुई, जिससे हालात और ज्यादा गंभीर हो गए।
इसके जवाब में Iran ने इजराइल और अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की। इतना ही नहीं, उसने दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक Strait of Hormuz को भी बंद कर दिया।

इस कदम का सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ा, जिससे कीमतों में तेजी से उछाल देखने को मिला।
शांति की कोशिश या रणनीतिक चाल?
जहां एक तरफ अमेरिका खुद को युद्ध से दूर बता रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीन पर हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक “रणनीतिक शब्दों का खेल” हो सकता है, ताकि कानूनी और राजनीतिक दबाव से बचा जा सके।
कई विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका सीधे युद्ध की घोषणा से बचते हुए भी अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखना चाहता है। इससे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत रख सकता है, बिना औपचारिक युद्ध में फंसे।
वैश्विक असर
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं है। एशिया, यूरोप और अमेरिका के बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। भारत जैसे देशों में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर इसका असर पड़ सकता है।
अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यह संकट और गहरा सकता है। फिलहाल दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि 60 दिन की डेडलाइन खत्म होने के बाद अमेरिका क्या कदम उठाता है।
