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90 मिनट की फोन कॉल में Vladimir Putin ने Donald Trump को ईरान के 11 टन यूरेनियम पर मदद की पेशकश की

न्यूक्लियर डील टूटने के बाद ईरान के बढ़ते यूरेनियम भंडार ने बढ़ाई वैश्विक चिंता, रूस ने मध्यस्थता का संकेत दिया

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पुतिन और ट्रंप के बीच फोन वार्ता के बाद ईरान के यूरेनियम भंडार को लेकर बढ़ी वैश्विक कूटनीतिक हलचल
पुतिन और ट्रंप के बीच फोन वार्ता के बाद ईरान के यूरेनियम भंडार को लेकर बढ़ी वैश्विक कूटनीतिक हलचल

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के बीच हाल ही में लगभग 90 मिनट तक एक महत्वपूर्ण फोन कॉल हुई, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर गंभीर चर्चा हुई।

इस बातचीत में सबसे अहम मुद्दा ईरान के पास मौजूद लगभग 11 टन (22,000 पाउंड) संवर्धित यूरेनियम बताया जा रहा है। यह वही सामग्री है जो परमाणु क्षमता के लिहाज से बेहद संवेदनशील मानी जाती है और वैश्विक सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

ईरान का बढ़ता परमाणु भंडार कैसे बना चिंता का कारण?

पिछले आठ वर्षों में ईरान ने धीरे-धीरे अपना यूरेनियम भंडार बढ़ाया है। 2015 में हुए परमाणु समझौते (JCPOA) के बाद उम्मीद थी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित रखेगा, लेकिन 2018 में जब अमेरिका ने इस समझौते से खुद को अलग कर लिया, तो स्थिति बदल गई।

इसके बाद से ईरान पर प्रतिबंध और दबाव बढ़ते गए, लेकिन इसके साथ ही उसके संवर्धित यूरेनियम भंडार में भी लगातार वृद्धि होती रही। विशेषज्ञों के अनुसार, यह भंडार अब लगभग 11 टन तक पहुंच चुका है, जो किसी भी क्षेत्रीय या वैश्विक तनाव की स्थिति में बड़ा खतरा बन सकता है।

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पुतिन की भूमिका और संभावित मध्यस्थता

सूत्रों के अनुसार, इस फोन कॉल में रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने संकेत दिया कि रूस इस मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया जा रहा है कि ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव किसी बड़े टकराव में न बदले।

रूस पहले भी ईरान के परमाणु मुद्दे पर कूटनीतिक भूमिका निभा चुका है और खुद को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है।

पुतिन और ट्रंप के बीच फोन वार्ता के बाद ईरान के यूरेनियम भंडार को लेकर बढ़ी वैश्विक कूटनीतिक हलचल


ट्रंप की स्थिति और वैश्विक प्रतिक्रिया

पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में ही अमेरिका ने ईरान परमाणु समझौते से हटने का फैसला किया था, जिसे इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत माना जाता है। अब एक बार फिर उनकी भूमिका चर्चा में है, क्योंकि यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव पहले से ही बढ़ा हुआ है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो यह मुद्दा भविष्य में बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले सकता है।

आगे की राह क्या?

फिलहाल दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या रूस की संभावित मध्यस्थता कोई नया समझौता ला पाएगी या नहीं। ईरान का यूरेनियम भंडार और पश्चिमी देशों की चिंताएं आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति की दिशा तय कर सकती हैं।

यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर दिखाता है कि परमाणु राजनीति केवल देशों की सुरक्षा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की स्थिरता से जुड़ा हुआ मुद्दा है।

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