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PM मोदी की 6 दिन की विदेश यात्रा से भारत को मिले ‘तीन सुरक्षा कवच’, विपक्ष के निशाने के बीच कैसे मजबूत हुई देश की ताकत?
ऊर्जा संकट, वैश्विक युद्ध और आर्थिक अनिश्चितता के दौर में पीएम मोदी की यूरोप और खाड़ी यात्रा को भारत के लिए बड़ा रणनीतिक कदम माना जा रहा है। तेल, सेमीकंडक्टर और रक्षा निर्माण पर हुए समझौतों ने दुनिया को नया संदेश दिया।
दुनिया इस वक्त एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां हर बड़ा देश किसी न किसी संकट से जूझ रहा है। कहीं युद्ध की आग है, कहीं तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, तो कहीं सप्लाई चेन टूटने का डर लगातार बना हुआ है। ऐसे माहौल में भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया विदेश यात्रा सिर्फ एक कूटनीतिक दौरा नहीं, बल्कि आने वाले समय की तैयारी मानी जा रही है।
सिर्फ 6 दिनों में पीएम मोदी ने Abu Dhabi Netherlands स्वीडन, Norway और इटली का दौरा किया। इस यात्रा को लेकर दावा किया जा रहा है कि भारत ने अपने लिए तीन बड़े “सुरक्षा कवच” तैयार किए हैं — ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और रक्षा।
पहला कवच: ऊर्जा सुरक्षा
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट की आशंका ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से तेल के रूप में हासिल करता है। ऐसे समय में पीएम मोदी का सबसे पहले यूएई पहुंचना रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना गया।
अबू धाबी में भारत और यूएई के बीच ऊर्जा और निवेश को लेकर कई अहम समझौते हुए। रिपोर्ट्स के मुताबिक यूएई ने भारत में अरबों डॉलर के नए निवेश का भरोसा दिया। इससे भारत की रिफाइनरी और ऊर्जा सप्लाई को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
इसके बाद नॉर्वे में भारत ने भविष्य की ऊर्जा यानी ग्रीन हाइड्रोजन और ऑफशोर विंड एनर्जी पर फोकस किया। भारत और नॉर्डिक देशों के बीच ग्रीन टेक्नोलॉजी को लेकर नई साझेदारी बनी। इसका मतलब साफ है कि भारत सिर्फ आज के तेल पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि आने वाले दशक की ऊर्जा जरूरतों की तैयारी भी कर रहा है।
दूसरा कवच: अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी
दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अब सिर्फ सेना नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन मानी जाती है। इसी दिशा में पीएम मोदी की यूरोप यात्रा का दूसरा बड़ा लक्ष्य था आर्थिक मजबूती।
नीदरलैंड्स में भारतीय कंपनी टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और डच कंपनी ASML के बीच अहम साझेदारी हुई। ASML वही कंपनी है जिसकी मशीनों के बिना दुनिया के सबसे एडवांस चिप नहीं बन सकते। माना जा रहा है कि इससे गुजरात के धोलेरा में बनने वाली सेमीकंडक्टर फैक्ट्री को बड़ा फायदा मिलेगा।
स्वीडन के साथ भारत ने 6G, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे भविष्य के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाया। वहीं इटली के साथ व्यापार को 2029 तक 20 बिलियन यूरो तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया।
इसी दौरान इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) पर भी चर्चा तेज हुई। अगर यह प्रोजेक्ट पूरी तरह आकार लेता है, तो भारत से यूरोप तक सामान पहुंचाने का समय काफी कम हो सकता है।
तीसरा कवच: रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता
पीएम मोदी की यात्रा का सबसे अहम और शायद सबसे शांत हिस्सा रक्षा क्षेत्र से जुड़ा रहा। भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि खुद रक्षा निर्माण का केंद्र बनने की तैयारी में है।
स्वीडन की रक्षा कंपनी साब (Saab) ने हरियाणा के झज्जर में अपनी पहली विदेशी रक्षा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसे भारत का पहला 100 प्रतिशत विदेशी निवेश वाला रक्षा उत्पादन प्रोजेक्ट माना जा रहा है।
इसके अलावा नीदरलैंड्स और यूएई के साथ भी रक्षा सहयोग और टेक्नोलॉजी साझेदारी को लेकर चर्चा हुई। इससे साफ संकेत मिलता है कि “आत्मनिर्भर भारत” अब सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जमीनी रणनीति बनता जा रहा है।
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दुनिया से मिला सम्मान
इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी को कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले। स्वीडन ने उन्हें “रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार” से सम्मानित किया, जबकि नॉर्वे ने अपने सर्वोच्च सम्मानों में से एक “ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट” प्रदान किया।
इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) ने भी भारत की खाद्य सुरक्षा योजनाओं और किसानों के लिए किए गए कामों को लेकर सम्मान दिया।
विपक्ष के सवाल और सरकार का जवाब

जहां सरकार इस दौरे को भारत की वैश्विक ताकत बढ़ाने वाला कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे लेकर सवाल भी उठा रहा है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का कहना है कि विदेश यात्राओं का प्रचार ज्यादा किया जाता है, जबकि असली मुद्दों पर कम ध्यान दिया जाता है।
हालांकि सरकार समर्थकों का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक हालात में भारत को मजबूत साझेदारियों की जरूरत है और पीएम मोदी की यह यात्रा उसी रणनीति का हिस्सा थी।
बदलती दुनिया में भारत की नई भूमिका
बीते कुछ वर्षों में भारत ने खुद को सिर्फ एक विकासशील देश के तौर पर नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद वैश्विक साझेदार के रूप में पेश करने की कोशिश की है। यही वजह है कि ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और रक्षा जैसे अहम क्षेत्रों में कई देश भारत के साथ दीर्घकालिक साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं।
पीएम मोदी की यह यात्रा इसी बड़े बदलाव की तस्वीर दिखाती है, जहां भारत सिर्फ संकट से बचने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि भविष्य के लिए खुद को तैयार भी कर रहा है।
