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क्या खत्म होने वाला है ईरान युद्ध? 14 पॉइंट समझौते में क्या-क्या तय होना बाकी, जानिए पूरा मामला

मिडिल ईस्ट में शांति की कोशिशें तेज़, लेकिन परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर अब भी फंसी बातचीत

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Dainik Diary Zaid 37
ईरान और अमेरिका के बीच संभावित समझौते को लेकर बातचीत तेज़, लेकिन कई बड़े मुद्दों पर अब भी बनी हुई है दूरी।

मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी तनाव और संघर्ष के बीच अब एक संभावित समझौते को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनने की खबर सामने आई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध खत्म होने की घोषणा अभी भी दूर हो सकती है।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माईल बघाई ने सोमवार को कहा कि संभावित 14-पॉइंट मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी समझौता ज्ञापन के कई बिंदुओं पर निष्कर्ष निकल चुके हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मिडिल ईस्ट युद्ध तुरंत खत्म होने वाला है।

क्या है इस समझौते का मुख्य उद्देश्य?

रिपोर्ट्स के मुताबिक इस प्रस्तावित समझौते का मुख्य मकसद युद्ध को रोकना और क्षेत्र में स्थिरता लाना है। इसके तहत अमेरिका द्वारा लगाए गए नौसैनिक दबाव और नेवल ब्लॉकेड को खत्म करने पर चर्चा हो रही है।

इसके बदले ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सुरक्षित समुद्री आवाजाही सुनिश्चित करनी होगी। यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। यहां किसी भी तरह का तनाव पूरी दुनिया के तेल बाजार और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

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किन मुद्दों पर अब भी अटकी है बातचीत?

हालांकि दोनों पक्षों ने बातचीत में प्रगति की बात कही है, लेकिन कुछ बड़े मुद्दे अब भी विवाद की वजह बने हुए हैं।

सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। पश्चिमी देशों और अमेरिका को लंबे समय से आशंका रही है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। वहीं ईरान लगातार कहता आया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।

इसके अलावा इज़राइल और लेबनान में चल रहे संघर्ष भी इस बातचीत को प्रभावित कर रहे हैं। इज़राइल की लड़ाई में ईरान समर्थित संगठन हिज़्बुल्लाह का नाम भी लगातार सामने आता रहा है।

ईरान की ओर से आर्थिक प्रतिबंध हटाने और विदेशों में फ्रीज़ की गई संपत्तियों को वापस देने की मांग भी बातचीत का अहम हिस्सा बनी हुई है।

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60 दिनों का प्रस्ताव

सूत्रों के मुताबिक दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि अगर शुरुआती समझौता हो जाता है तो अंतिम डील के लिए वार्ताकारों को 60 दिन का समय दिया जाएगा।

यानी पहले युद्ध रोकने और तनाव कम करने की कोशिश होगी, उसके बाद बाकी बड़े मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की जाएगी।

दुनिया की नजरें इस समझौते पर

अगर यह समझौता सफल होता है तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतों, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।

भारत समेत कई देशों की नजरें भी इस बातचीत पर टिकी हुई हैं क्योंकि मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव पहले ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर असर डाल चुका है।

हालांकि फिलहाल स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध और क्षेत्रीय संघर्ष जैसे मुद्दों पर ठोस सहमति नहीं बनती, तब तक स्थायी शांति की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।

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