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Suvendu Adhikari: वो शागिर्द जिसने उस्ताद को हराया और अब उसके घर में घुसकर चुनौती दे रहा है
Nandigram से Bhabanipur तक — Mamata Banerjee और Suvendu Adhikari की सियासी जंग अब और खतरनाक मोड़ पर आ गई है
Bengal की राजनीति हमेशा से आग और तूफान का मेल रही है। लेकिन जो कहानी इन दिनों सबसे ज़्यादा चर्चा में है, वो है एक ऐसे शागिर्द की, जिसने अपने उस्ताद को उन्हीं के घर में जाकर मात दी — और अब एक बार फिर वही करने की तैयारी में है।
Suvendu Adhikari और Mamata Banerjee — दो नाम, एक पुरानी दोस्ती, और एक ऐसी दुश्मनी जो Bengal की सियासत को हिला रही है।
शागिर्द की शुरुआत Congress से Trinamool तक
Suvendu Adhikari कोई साधारण नेता नहीं हैं। उनके पिता Sisir Adhikari Congress के दिग्गज नेता और पूर्व प्रधानमंत्री Manmohan Singh की सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। Purba Medinipur (East Midnapore) में Adhikari परिवार को लोग “राजनीतिक राजघराना” कहते हैं — इतना गहरा है उनका प्रभाव।
Suvendu ने भी अपने पिता की राह पर चलते हुए Congress से अपना सफ़र शुरू किया। Kanthi नगर पालिका में पार्षद बने। फिर 1998 में Mamata Banerjee की Trinamool Congress का दामन थाम लिया। 2006 में Kanthi Dakshin से MLA बने और असली पहचान मिली 2007 में — Nandigram आंदोलन में।
Nandigram जहाँ शागिर्द ने खुद को साबित किया
2007 में Left Front सरकार Salim Group of Indonesia के लिए एक chemical hub बनाने की योजना लाई थी। इसके लिए Special Economic Zone (SEZ) के तहत 10,000 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण होनी थी। Nandigram के किसान सड़कों पर उतर आए।
Suvendu Adhikari ने Bhumi Uchhed Pratirodh Committee की अगुवाई की — यानी ज़मीन छीने जाने के खिलाफ समिति। 14 मार्च 2007 को पुलिस की गोली से 14 आंदोलनकारी मारे गए। पूरे Bengal में आग लग गई। सरकार को झुकना पड़ा और प्रोजेक्ट रद्द हो गया।
इसी आंदोलन ने और Hooghly जिले के Singur में Tata Motors प्लांट विरोध ने Trinamool Congress को 2011 में सत्ता दिलाई — Left Front का 34 साल का राज खत्म हुआ।
विश्वासपात्र से दूसरे नंबर का नेता और फिर बगावत
जीत के बाद Suvendu को इनाम मिला — 2009 और 2014 में Tamluk से Lok Sabha सांसद बने। 2016 में Trinamool की दोबारा जीत के बाद Mamata ने उन्हें Bengal कैबिनेट में Transport मंत्री बनाया।
लेकिन धीरे-धीरे हालात बदले। Mamata के भांजे Abhishek Banerjee की पार्टी में पकड़ मज़बूत होती गई। राजनीतिक रणनीतिकार Prashant Kishor का दबदबा बढ़ा। Suvendu को लगने लगा कि उनकी कुर्सी छोटी होती जा रही है।
नवंबर 2020 में उन्होंने Transport और Irrigation मंत्रालय से इस्तीफा दिया। दिसंबर 2020 में BJP का दामन थाम लिया — सीधे 2021 विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले।
2021 का Nandigram जब शागिर्द ने उस्ताद को हराया
Mamata Banerjee ने ठान लिया — वो खुद Nandigram से लड़ेंगी और साबित करेंगी कि असली वफ़ादारी किसके साथ है। BJP ने Suvendu को “गद्दार” कहा। Trinamool ने भी।
लेकिन चुनाव नतीजे ने पूरी राजनीति को हिला दिया। BJP भले ही 77 सीटों पर सिमट गई और Trinamool ने 215 सीटें जीतीं — लेकिन Nandigram में Suvendu Adhikari ने Mamata Banerjee को हरा दिया।
वो पल Bengal की राजनीति में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

2026 अब उस्ताद के घर में दस्तक
अब 2026 है। 55 साल के Suvendu Adhikari Bengal विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और BJP के मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदारों में से एक।
इस बार वो सिर्फ Nandigram से नहीं लड़ रहे — वो Bhabanipur से भी ताल ठोक रहे हैं। यही वो सीट है जहाँ Mamata Banerjee खुद रहती हैं। Kalighat में उनका घर है। यह उनकी अपनी बस्ती है।
Mamata ने इसे “शांति भंग करने की कोशिश” बताया। एक रैली में उन्होंने कहा — “मैंने इस घर में पूरी ज़िंदगी बिताई है। मुझे हर गली पता है। Midnapore से आया कोई शख्स सोचता है कि Bhabanipur के लोगों को खरीदा या डराया जा सकता है — लेकिन वो करारा जवाब देंगे।”
Suvendu ने पलटवार किया — “मुझे मेरे अपने राज्य की राजधानी में बाहरी कहते हैं? West Bengal का हर कोना हर Bengali का है। मैं Bengal का ‘भूमिपुत्र’ हूँ — जबकि उनकी विचारधारा कहीं और से आयातित है।”
आगे क्या?
Nandigram 2021 की तरह Bhabanipur 2026 भी Bengal की सबसे बड़ी जंग से बड़ी लड़ाई बन सकती है। जो भी जीता — उसके लिए यह सिर्फ एक सीट नहीं, पूरे Bengal पर दावे की मुहर होगी।
शागिर्द और उस्ताद की यह लड़ाई — Bengal की राजनीति में एक नया इतिहास लिखने वाली है।
