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हर बार GPS चलाते ही ‘मुड़ जाता है समय’! आइंस्टीन का जादू कैसे देता है सही रास्ता
Google Maps से लोकेशन शेयर करने तक—हर नेविगेशन के पीछे छिपा है रिलेटिविटी का विज्ञान
क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप अपने फोन में Google Maps खोलकर रास्ता ढूंढते हैं, तो असल में आप 100 साल पुराने एक वैज्ञानिक सिद्धांत पर भरोसा कर रहे होते हैं? यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन सच यही है कि हर बार GPS इस्तेमाल करते वक्त हम Albert Einstein के सिद्धांतों का उपयोग कर रहे होते हैं।
दरअसल, GPS यानी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम पृथ्वी के चारों ओर घूम रहे सैटेलाइट्स पर निर्भर करता है। ये सैटेलाइट्स करीब 20,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर बेहद तेज गति (लगभग 14,000 किमी/घंटा) से घूमते हैं। यहां से शुरू होती है “समय की गड़बड़ी”।
आइंस्टीन के दो बड़े सिद्धांत—Special Theory of Relativity और General Theory of Relativity—बताते हैं कि समय हर जगह एक जैसा नहीं चलता।
पहला सिद्धांत कहता है कि तेज गति से चलने वाली चीजों के लिए समय धीमा हो जाता है। यानी सैटेलाइट्स की घड़ी पृथ्वी के मुकाबले थोड़ी धीमी चलती है। वहीं दूसरा सिद्धांत बताता है कि जहां गुरुत्वाकर्षण कम होता है, वहां समय तेज चलता है—और सैटेलाइट्स पर यही होता है।
इन दोनों प्रभावों को मिलाकर देखें तो सैटेलाइट्स की घड़ियां रोजाना लगभग 38 माइक्रोसेकंड तेज हो जाती हैं। अब आप सोचेंगे—इतना छोटा फर्क क्या मायने रखता है?
यहीं असली ट्विस्ट है। अगर इस फर्क को ठीक न किया जाए, तो GPS हर दिन कई किलोमीटर तक गलत लोकेशन दिखाने लगेगा। यानी आप जिस रास्ते पर चल रहे हैं, ऐप आपको किसी और जगह पहुंचा सकता है!

इसीलिए GPS सिस्टम में इन समय के अंतर को लगातार ठीक किया जाता है, ताकि आपको सटीक दिशा मिल सके।
आइंस्टीन का यह विचार कि “समय और स्थान स्थिर नहीं, बल्कि बदलते रहते हैं”, आज हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है। 1971 में वैज्ञानिकों ने हवाई जहाज में एटॉमिक क्लॉक्स भेजकर यह साबित भी किया था कि तेज गति से समय सच में धीमा पड़ता है।
सोचिए, एक सदी पहले दिया गया सिद्धांत आज आपकी रोज की ड्राइविंग, कैब बुकिंग और लोकेशन शेयरिंग को आसान बना रहा है।
अगली बार जब आप GPS से रास्ता पूछें, तो याद रखिए—आप सिर्फ मैप नहीं देख रहे, बल्कि समय और अंतरिक्ष के एक अद्भुत खेल का हिस्सा बन रहे हैं।
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