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AAP में टूट: Raghav Chadha और 6 सांसदों के BJP में ‘विलय’ ने Anti-Defection Law की बुनियाद को हिलाया
क्या सिर्फ दो-तिहाई संख्याबल से हो सकता है वैध ‘merger’? Tenth Schedule की वह धारा जिसे लेकर अब Supreme Court तक जा सकता है मामला
भारतीय राजनीति में एक बड़ा भूचाल आया है। Aam Aadmi Party (AAP) के Raghav Chadha समेत सात Rajya Sabha सांसदों ने पार्टी से नाता तोड़कर Bharatiya Janata Party (BJP) में ‘विलय’ का ऐलान कर दिया है। लेकिन यह मामला महज एक राजनीतिक उथल-पुथल नहीं है। इसने भारत के संविधान की Tenth Schedule यानी दल-बदल विरोधी कानून की उस बुनियादी धारा पर सवाल खड़े कर दिए हैं जिसे ‘merger’ का अपवाद कहा जाता है।
क्या है दल-बदल विरोधी कानून और merger का अपवाद?
1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू हुई Tenth Schedule उन विधायकों और सांसदों को अयोग्य ठहराती है जो स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ते हैं या पार्टी के whip की अवज्ञा करते हैं। शुरुआत में इस कानून में दो अपवाद थे: split और merger। 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए split वाला अपवाद हटा दिया गया क्योंकि उसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा था। अब सिर्फ merger का अपवाद बचा है।
Paragraph 4 के तहत यह प्रावधान है कि अगर किसी legislature party के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय का समर्थन करें, तो उन्हें disqualification से छूट मिलती है। Rajya Sabha में AAP के कुल सांसदों में से सात ने यह कदम उठाया है जो दो-तिहाई की संख्या को पूरा करता है।
असली सवाल: क्या सिर्फ संख्या काफी है?
यहीं से विवाद शुरू होता है। Paragraph 4 की भाषा में “original political party” यानी मूल राजनीतिक दल का स्पष्ट उल्लेख है। इसका अर्थ यह है कि merger सिर्फ legislature party के स्तर पर नहीं, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक स्तर पर भी होनी चाहिए।
सीधे शब्दों में कहें तो सांसद अपने दम पर merger का ऐलान नहीं कर सकते जब तक कि खुद पार्टी ने औपचारिक रूप से विलय का फैसला न किया हो। लेकिन कई राज्यों में Speakers और courts ने सिर्फ दो-तिहाई संख्याबल को ही merger के लिए पर्याप्त मान लिया है, जो इस कानून को numbers का खेल बना देता है।
Supreme Court का अहम फैसला
2023 में Supreme Court ने Subhash Desai बनाम Principal Secretary, Governor of Maharashtra मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया था। हालांकि वह मामला सीधे merger से जुड़ा नहीं था, लेकिन Court ने political party और legislature party के बीच स्पष्ट अंतर रेखा खींची। Court ने कहा कि legislature party, political party से स्वतंत्र होकर काम नहीं कर सकती। अगर ऐसा हुआ तो दल-बदल विरोधी कानून का पूरा मकसद ही खत्म हो जाएगा।
इस तर्क को AAP मामले पर लागू करें तो यह स्पष्ट होता है कि सांसद अकेले merger की घोषणा नहीं कर सकते।
Goa का Chodankar मामला और कानूनी उलझन

2022 में Bombay High Court ने Goa में हुए defections के एक मामले में सिर्फ दो-तिहाई विधायकों के आधार पर merger को वैध मान लिया था, बिना यह देखे कि मूल पार्टी ने भी विलय का फैसला किया या नहीं। यह मामला अब Girish Chodankar बनाम Speaker, Goa Legislative Assembly के नाम से Supreme Court में pending है। इस मामले का फैसला तय करेगा कि Paragraph 4 को conjunctively यानी party merger और legislative support दोनों जरूरी हैं, इस तरह पढ़ा जाए या disjunctively यानी सिर्फ संख्याबल काफी है।
Rajya Sabha Chairman की भूमिका
फिलहाल सातों सांसदों का भविष्य Rajya Sabha Chairman के हाथ में है। उनके सामने disqualification petition दाखिल होने की पूरी संभावना है। Chairman को तय करना होगा कि यह claimed merger, Paragraph 4 की शर्तें पूरी करता है या यह defection है। एक और पेचीदगी यह है कि disqualification petition के निपटारे के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है, जिससे ये सांसद एक संवैधानिक limbo में फंसे रह सकते हैं।
यह सिर्फ AAP का संकट नहीं, लोकतंत्र की परीक्षा है
AAP की यह टूट सिर्फ एक पार्टी की आंतरिक समस्या नहीं है। यह भारत की दल-बदल विरोधी व्यवस्था की सबसे बड़ी constitutional stress test है। अगर सिर्फ संख्याबल से merger को वैध माना जाने लगा, तो Tenth Schedule की पूरी भावना खतरे में पड़ जाएगी। और अगर party-level merger की शर्त अनिवार्य मानी गई, तो विधायकों और सांसदों की जवाबदेही और मजबूत होगी।
Chodankar मामले में Supreme Court का जो भी फैसला आएगा, वह आने वाले दशकों तक भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा।

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