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मीनाब में 165 मासूम बच्चियों की मौत पर Akhilesh Yadav का फूटा दर्द कहा, “यह इंसानियत का क़त्ल है”
सपा प्रमुख ने खामेनेई पर हुए हमले और ईरान के स्कूल पर इज़रायली-अमेरिकी हवाई हमले की कड़ी निंदा की; भारत सरकार से भी पूछा — “आप जंग के साथ हैं या अमन के?”
नई दिल्ली। जब किसी स्कूल की छत किताबों और बस्तों पर नहीं, बल्कि मिसाइलों के मलबे के नीचे दब जाए — तो दुनिया को बोलना ही पड़ता है। ईरान के मीनाब शहर में 28 फरवरी 2026 को कुछ ऐसा ही हुआ। सुबह की पहली घंटी बजी थी, बच्चियाँ अपनी कक्षाओं में बैठ चुकी थीं — और तभी इज़रायली-अमेरिकी हमले में “शजरह तय्येबह” गर्ल्स प्राइमरी स्कूल मिट्टी में मिल गया। ईरानी राज्य मीडिया के अनुसार इस हमले में 165 बच्चियों और स्कूल स्टाफ की जान गई, जबकि 95 से अधिक घायल हुए। मरने वालों में अधिकतर 7 से 12 साल की बच्चियाँ थीं।
इस दिल दहलाने वाली घटना पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर लिखा कि समाजवादी पार्टी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई पर हुए हमले और मीनाब के स्कूल पर हुए इस नृशंस हवाई हमले — दोनों की कड़ी निंदा करती है।
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अखिलेश ने कहा — “जिनेवा कन्वेंशन को ताक पर रख दिया गया”
अखिलेश यादव ने इस हमले को केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों का खुला उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि जिनेवा कन्वेंशन और अंतर्राष्ट्रीय कानून — जो युद्ध के दौरान भी मानव जीवन की सुरक्षा के लिए बने हैं — इन हमलों से गंभीर खतरे में आ गए हैं। उन्होंने शहीद हुई बच्चियों और उनके परिवारों के प्रति शोक और एकजुटता व्यक्त की।
यह बात गौरतलब है कि यूनेस्को और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफज़ई ने भी इस हमले की निंदा की है। अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत किसी भी शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल या नागरिक ढांचे पर जानबूझकर हमला करना युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है।
मोदी सरकार से भी पूछा कड़ा सवाल
अखिलेश यादव यहीं नहीं रुके। उन्होंने केंद्र की बीजेपी सरकार पर भी निशाना साधते हुए सवाल किया कि आखिर भारत सरकार इस अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर अपना रुख साफ क्यों नहीं कर रही? उन्होंने कहा — “हमारे देश की सरकार बताए कि वह जंग के साथ है या अमन के। एक तटस्थ देश होने के नाते भारत को युद्ध रोकने और शांति बहाल करने के लिए कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए।”

उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध के दौरान फैलाई जाने वाली भ्रामक खबरों से सावधान रहने की जरूरत है और सरकार को मृतकों की संख्या से जुड़ी खबरों की पुष्टि करनी चाहिए। “युद्धकालीन खबरें अक्सर रणनीति का हिस्सा होती हैं, इसलिए उनकी पड़ताल जरूरी है,” उन्होंने कहा।
पूरे देश में उठी निंदा की आवाज़
इस मुद्दे पर विपक्ष एकजुट नजर आया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी वाड्रा, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और शिवसेना (UBT) की प्रियंका चतुर्वेदी — सभी ने खामेनेई की मौत और मीनाब के स्कूल हमले पर भारत सरकार की चुप्पी को “नैतिक नेतृत्व का परित्याग” बताया।
3 मार्च को मीनाब के एक सार्वजनिक चौक में हजारों लोगों की मौजूदगी में उन 165 बच्चियों का सामूहिक अंतिम संस्कार किया गया। तस्वीरें देखकर दुनिया भर के लोगों की आँखें नम हो गईं — इरानी झंडों में लिपटे ताबूत, उन्हें कंधे पर उठाए बेबस माँ-बाप और बिलखती भीड़।
एक सवाल जो हर इंसान से है
मीनाब का यह हमला सिर्फ ईरान की त्रासदी नहीं है — यह उस सभ्यता पर सवाल है जो खुद को “लोकतंत्र का रक्षक” कहती है। जब स्कूल बम से उड़ाए जाएं और 7 साल की बच्चियाँ युद्ध की बलि चढ़ें — तो चुप रहना भी एक अपराध है। अखिलेश यादव ने अपनी आवाज उठाई, अब सवाल है कि दिल्ली की सत्ता कब बोलेगी?
