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FPI क्यों बेच रहे हैं भारतीय शेयर? Shankar Sharma ने बताया चौंकाने वाला कारण
विदेशी निवेशकों के निकलने के पीछे SIP का बड़ा रोल, मार्केट के ‘गेम’ को समझना जरूरी
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों (FPI) की लगातार बिकवाली को लेकर काफी चर्चा हो रही है। आमतौर पर इसके पीछे वैश्विक कारणों को जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन मार्केट एक्सपर्ट Shankar Sharma ने इस पर एक अलग और दिलचस्प नजरिया पेश किया है।
उनका कहना है कि FPI के बाहर जाने की असली वजह विदेश नहीं, बल्कि देश के अंदर से आ रही ताकत—यानी SIP निवेश है।
SIP बन रहा है बड़ा गेमचेंजर
Systematic Investment Plan (SIP) के जरिए भारतीय निवेशक हर महीने बड़ी मात्रा में पैसा शेयर बाजार में डाल रहे हैं।
Sharma के मुताबिक, यही पैसा अब मार्केट में इतनी ताकत पैदा कर रहा है कि विदेशी निवेशकों को अपने शेयर बेचने का मौका मिल रहा है।
उन्होंने साफ कहा—
“मार्केट में हर खरीदार के लिए एक विक्रेता जरूरी होता है। जब SIP से पैसा आ रहा है, तो कोई न कोई बेच भी रहा है—और वही FPI हैं।”
बदली हुई मार्केट की तस्वीर
पहले भारतीय बाजार काफी हद तक विदेशी निवेश पर निर्भर था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है—
- रिटेल निवेशकों की संख्या तेजी से बढ़ी है
- म्यूचुअल फंड्स में SIP का रिकॉर्ड निवेश हो रहा है
- घरेलू निवेश बाजार को स्थिर बनाए रख रहा है
इस वजह से, FPI की बिकवाली के बावजूद बाजार में बड़ी गिरावट नहीं दिख रही।
पारंपरिक सोच से अलग नजरिया
आमतौर पर FPI आउटफ्लो के पीछे ये कारण बताए जाते हैं—
- अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ना
- डॉलर मजबूत होना
- ग्लोबल अनिश्चितता
लेकिन Shankar Sharma का कहना है कि सिर्फ यही वजह नहीं है।
घरेलू निवेश (SIP) अब बाजार की दिशा तय करने में उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।
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क्या SIP और FPI साथ-साथ बढ़ सकते हैं?
Sharma का मानना है कि यह संभव नहीं है कि दोनों एक साथ लगातार खरीदारी करें।
उन्होंने इसे आसान शब्दों में समझाते हुए कहा—
“अगर हर कोई खरीद रहा होगा, तो बेच कौन रहा होगा?”
यानी बाजार में संतुलन बनाए रखने के लिए एक पक्ष को बेचना ही पड़ता है।
निवेशकों के लिए क्या संकेत?
इस ट्रेंड से कुछ अहम बातें सामने आती हैं—
- भारतीय बाजार अब ज्यादा मजबूत और आत्मनिर्भर हो रहा है
- रिटेल निवेशकों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है
- FPI की बिकवाली अब उतनी डरावनी नहीं रही

निष्कर्ष
FPI के बाहर जाने को केवल नकारात्मक नजर से देखने की जरूरत नहीं है।
यह एक संकेत भी हो सकता है कि भारतीय बाजार में घरेलू निवेशकों की ताकत बढ़ रही है—जो आने वाले समय में बाजार को और स्थिर बना सकती है।
