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अमेरिका-ईरान डील बस ‘कुछ कदम दूर’ थी… फिर क्यों टूट गई बातचीत? इस्लामाबाद से आई बड़ी वजह
21 घंटे चली मैराथन बातचीत बेनतीजा खत्म, ईरान ने अमेरिका पर लगाए ‘शर्तें बदलने’ और ‘दबाव की राजनीति’ के आरोप
दुनिया जिस समझौते का इंतज़ार कर रही थी, वह आखिरकार आखिरी मोड़ पर आकर टूट गया। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई हाई-लेवल बातचीत उस समय अचानक खत्म हो गई, जब दोनों देश समझौते के बेहद करीब बताए जा रहे थे।
ईरान ने खुद दावा किया है कि डील “सिर्फ कुछ इंच दूर” थी, लेकिन आखिरी समय पर हालात बदल गए। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर मध्य पूर्व में तनाव बढ़ा दिया है और वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है।
21 घंटे चली बातचीत, लेकिन नतीजा शून्य
सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच लगभग 21 घंटे तक लगातार बातचीत चली। यह बातचीत पिछले कई दशकों में सबसे अहम मानी जा रही थी। इसका मकसद 2026 के संघर्ष के बाद बने नाजुक युद्धविराम को स्थिर करना और आगे का रास्ता तय करना था।
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लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद दोनों पक्ष किसी साझा सहमति पर नहीं पहुंच सके और बातचीत बिना किसी समझौते के खत्म हो गई।
ईरान का आरोप: अमेरिका ने बदली शर्तें
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने खुलकर अमेरिका पर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उनकी टीम “पूरी ईमानदारी से” बातचीत कर रही थी, लेकिन आखिरी समय में अमेरिका ने अपनी शर्तें बदल दीं।
ईरान का कहना है कि बातचीत के दौरान अमेरिका ने “मैक्सिमलिज्म” (अत्यधिक मांगें), “शिफ्टिंग गोलपोस्ट” (बार-बार शर्तें बदलना) और दबाव बनाने की रणनीति अपनाई, जिससे समझौता टूट गया।
ईरानी राष्ट्रपति ने भी संकेत दिए कि अगर अमेरिका “दबाव की राजनीति” छोड़कर ईरान के अधिकारों का सम्मान करे, तो भविष्य में समझौता संभव है।
अमेरिका का जवाब: परमाणु मुद्दा बना सबसे बड़ा रोड़ा
दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष का कहना है कि बातचीत इसलिए विफल हुई क्योंकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर पीछे हटने को तैयार नहीं था।

अमेरिका चाहता था कि ईरान यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह बंद करे, जबकि ईरान इसे अपना अधिकार मानता है। यही मतभेद सबसे बड़ा विवाद बन गया।
भरोसे की कमी भी बनी बड़ी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरी बातचीत में सबसे बड़ी कमी “भरोसे” की रही। ईरान के नेताओं ने साफ कहा कि अमेरिका अब तक उनका विश्वास जीतने में नाकाम रहा है।
यानी दोनों देश बातचीत की मेज पर तो आए, लेकिन मन से एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर पाए।
समझौता क्यों था इतना अहम?
यह डील सिर्फ दो देशों के बीच का मामला नहीं था। इसके पीछे कई बड़े मुद्दे जुड़े थे:
- परमाणु हथियार कार्यक्रम
- आर्थिक प्रतिबंधों में राहत
- होरमुज जलडमरूमध्य में आवाजाही
- क्षेत्रीय सुरक्षा
अगर यह समझौता हो जाता, तो मध्य पूर्व में स्थिरता आ सकती थी और तेल की कीमतों पर भी असर पड़ता।
बातचीत टूटने के बाद क्या बदला?
बातचीत फेल होने के तुरंत बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए समुद्री नाकाबंदी की घोषणा कर दी, जिससे वैश्विक बाजार भी प्रभावित हुआ।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे तेल की कीमतों में तेजी और अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ सकता है।
क्या अभी भी बची है उम्मीद?
हालांकि बातचीत टूट गई है, लेकिन पूरी तरह से दरवाजे बंद नहीं हुए हैं। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों के बीच भविष्य में फिर से बातचीत की संभावना बनी हुई है।
इसका मतलब है कि कूटनीति की कोशिशें अभी खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन रास्ता बेहद मुश्किल जरूर हो गया है।
