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Donald Trump के लिए उलटी गिनती शुरू, ईरान युद्ध पर 60 दिन का कानूनी दबाव बना संकट
अमेरिका के “War Powers Act” के तहत 1 मई तय करेगा ट्रंप का अगला कदम—युद्ध जारी रहेगा या पीछे हटना होगा
मध्य पूर्व में जारी तनाव और ईरान-अमेरिका संघर्ष अब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह अमेरिका के भीतर कानूनी और राजनीतिक संकट का रूप भी ले चुका है। सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को 60 दिनों की कानूनी समयसीमा के बाद युद्ध रोकना होगा या वह इसे जारी रख सकते हैं।
यह पूरी स्थिति अमेरिका के “War Powers Resolution” यानी युद्ध शक्ति अधिनियम से जुड़ी हुई है, जिसके तहत यदि राष्ट्रपति बिना कांग्रेस की मंजूरी के सैन्य कार्रवाई शुरू करता है, तो उसे 60 दिनों के भीतर या तो युद्ध समाप्त करना होता है या फिर कांग्रेस से औपचारिक अनुमति लेनी होती है।
इस नियम के अनुसार अब तारीख 1 मई 2026 एक बेहद अहम “डेडलाइन” बन चुकी है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
कैसे शुरू हुआ यह संघर्ष
28 फरवरी को अमेरिका ने ईरान पर मिसाइल हमले किए थे। अमेरिका का दावा था कि यह कार्रवाई ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को कमजोर करने के लिए की गई थी। लेकिन इसके बाद हालात तेजी से बिगड़ गए और ईरान की जवाबी कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को युद्ध जैसे हालात में धकेल दिया।
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इस संघर्ष में सिर्फ दोनों देशों तक मामला सीमित नहीं रहा, बल्कि कई खाड़ी देश भी अप्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल हो गए। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया और तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिली।
रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक इस संघर्ष में 5,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें बड़ी संख्या में आम नागरिक और बच्चे शामिल हैं। साथ ही ऊर्जा ढांचे को 50 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ है।
तेल की कीमतें भी 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं, जिससे अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई देशों में ईंधन संकट जैसी स्थिति बन गई।
60 दिन का कानून और बढ़ता राजनीतिक तनाव
अमेरिकी कानून के अनुसार, राष्ट्रपति यदि बिना कांग्रेस की मंजूरी के सैन्य कार्रवाई करता है तो उसे 60 दिनों के भीतर कार्रवाई रोकनी होती है। इसमें 30 दिन का अतिरिक्त विस्तार तभी मिल सकता है जब राष्ट्रपति यह लिखित आश्वासन दे कि यह समय केवल सैनिकों की सुरक्षित वापसी के लिए है।
इस समयसीमा की शुरुआत 2 मार्च से मानी गई, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने कांग्रेस को औपचारिक रूप से हमले की जानकारी दी थी। इसी आधार पर 1 मई को अंतिम सीमा माना जा रहा है।
अमेरिका की राजनीति में बढ़ती दरार
अमेरिकी संसद में इस मुद्दे पर गहरी बहस छिड़ी हुई है। डेमोक्रेट सांसदों का कहना है कि राष्ट्रपति को इस युद्ध के लिए कांग्रेस से मंजूरी लेनी चाहिए थी।
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य Gregory Meeks ने कहा है कि यदि यह युद्ध अमेरिका के हित में है तो राष्ट्रपति को इसे संसद के सामने साबित करना होगा।

वहीं दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता ट्रंप के समर्थन में खड़े हैं। हाउस स्पीकर Mike Johnson ने कहा कि युद्ध के दौरान राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करना अमेरिका के हितों को कमजोर कर सकता है।
इस बीच कुछ रिपब्लिकन नेताओं के रुख में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। सीनेटर Rand Paul ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में और सांसद ट्रंप के खिलाफ जा सकते हैं।
ट्रंप की भाषा में बदलाव और रणनीति
खास बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, जो अक्सर अपने सख्त बयानों के लिए जाने जाते हैं, इस मुद्दे पर काफी सावधानी से बोल रहे हैं।
उन्होंने हाल ही में कहा था कि वह “युद्ध” शब्द का उपयोग नहीं करना चाहते क्योंकि इसके कानूनी परिणाम हो सकते हैं। उनके अनुसार यह एक “military operation” यानी सैन्य कार्रवाई है, न कि औपचारिक युद्ध।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप यह कोशिश कर रहे हैं कि कानूनी तौर पर उन्हें युद्ध की औपचारिक श्रेणी में न रखा जाए, ताकि कांग्रेस की मंजूरी की अनिवार्यता से बचा जा सके।
1 मई के बाद क्या होगा
अगर 1 मई तक कोई शांति समझौता नहीं होता, तो ट्रंप के सामने दो ही रास्ते होंगे—या तो सैन्य कार्रवाई को रोकना या फिर कांग्रेस से औपचारिक अनुमति लेना।
यह स्थिति न सिर्फ अमेरिका की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करेगी, बल्कि पूरी दुनिया में चल रहे ईरान संकट की दिशा भी तय करेगी।
फिलहाल, दुनिया एक ऐसी तारीख की ओर देख रही है जो सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि एक बड़े वैश्विक निर्णय का संकेत बन सकती है।
