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हॉर्मुज़ संकट और वैश्विक तेल राजनीति: कैसे Trump की एक चाल से चीन को मिला रणनीतिक फायदा

मध्य-पूर्व तनाव, समुद्री व्यापार की कमजोरी और ऊर्जा सुरक्षा की नई लड़ाई ने बदला वैश्विक शक्ति संतुलन; चीन की रणनीति और पश्चिम की चुनौती

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हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव के बीच तेल टैंकरों की आवाजाही और वैश्विक ऊर्जा राजनीति की बदलती तस्वीर

मध्य-पूर्व में हालिया तनाव और खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में पैदा हुई अस्थिरता ने एक बार फिर दुनिया को यह याद दिलाया है कि वैश्विक व्यापार कितनी नाज़ुक धमनियों पर टिका है। तेल और समुद्री शिपिंग की ये जीवनरेखाएँ जब हिलती हैं, तो उसका असर केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

लेकिन इस बार तस्वीर में एक बड़ा और अप्रत्याशित खिलाड़ी उभरकर सामने आया—चीन।

जहाँ पश्चिमी देशों के नीति-निर्माता ईरान से जुड़े तनाव और अमेरिकी कार्रवाई के तत्काल आर्थिक नुकसान को समझने में जुटे थे, वहीं बीजिंग ने इस पूरे घटनाक्रम को एक रणनीतिक अवसर के रूप में देखा। वर्षों से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में किए गए उसके प्रयास अब रंग लाते दिखे।

विश्लेषकों का मानना है कि पहले यह धारणा थी कि मध्य-पूर्व में किसी भी प्रकार की नाकाबंदी चीन को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है, क्योंकि उसकी तेल आयात पर भारी निर्भरता है। लेकिन बीजिंग ने पिछले एक दशक में इस निर्भरता को काफी हद तक संतुलित कर लिया है। उसने बड़े पैमाने पर रणनीतिक तेल भंडार बनाए, रूस और मध्य एशिया से पाइपलाइन के जरिए आपूर्ति बढ़ाई और घरेलू ऊर्जा संरचना में भी बदलाव किया।

हॉर्मुज़ संकट के दौरान जब पश्चिमी जहाज़ खतरों के कारण रुक गए, तब चीन से जुड़े तेल टैंकर अपेक्षाकृत सुरक्षित रूप से अपनी यात्रा जारी रखते रहे। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने भी कुछ देशों से जुड़े जहाज़ों को ‘गैर-शत्रुतापूर्ण’ मानते हुए गुजरने दिया, जिससे चीन को अस्थायी लाभ मिला।

हालांकि स्थिति तब बदल गई जब अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक दबाव बढ़ाया और एक तरह की नाकेबंदी जैसी स्थिति बन गई। इससे चीन की सस्ती तेल आपूर्ति पर असर पड़ा और बीजिंग को सार्वजनिक रूप से अमेरिका की नीति की आलोचना करनी पड़ी।

इसी दबाव के बीच तत्कालीन अमेरिकी नेतृत्व ने बयान दिया कि कार्रवाई को चीन के हितों को ध्यान में रखते हुए बदला जा रहा है—जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक असामान्य और विवादित संदेश माना गया।

चीन ने इस पूरे घटनाक्रम में अपनी घरेलू ऊर्जा ताकत को एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया। उसके पास दुनिया का सबसे बड़ा आपातकालीन पेट्रोलियम भंडार माना जाता है। साथ ही, वह कोयले का सबसे बड़ा उत्पादक है और रूस व तुर्कमेनिस्तान से गैस आयात लगातार बढ़ा रहा है। बिजली पर बढ़ती निर्भरता (लगभग 30% ऊर्जा खपत) ने भी उसकी ऊर्जा प्रणाली को अधिक स्थिर बनाया है।

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राजनीतिक मोर्चे पर भी बीजिंग ने स्थिति का लाभ उठाया। उसने खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया और खुद को “स्थिर साझेदार” के रूप में पेश किया। चीन लगातार यह संदेश दे रहा है कि वैश्विक व्यापार को किसी एक शक्ति के दबाव में नहीं होना चाहिए, बल्कि “अंतरराष्ट्रीय नियमों” के तहत चलना चाहिए।

सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि चीन इस संकट का उपयोग केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि वैश्विक रणनीति में भी कर रहा है। भारत के साथ व्यापार संबंधों में नरमी और संवाद बढ़ाने के प्रयास इसी दिशा में देखे जा रहे हैं, ताकि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाएँ बाहरी झटकों से सुरक्षित रह सकें।

लेकिन सबसे बड़ा रणनीतिक संकेत ताइवान के संदर्भ में देखा जा रहा है। चीन ने इस संकट को उदाहरण बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि दूरस्थ समुद्री रास्तों और विदेशी सुरक्षा गारंटियों पर पूरी तरह भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है। यह संदेश ताइवान की सुरक्षा नीति और उसके अंतरराष्ट्रीय साझेदारों पर दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

यूके और अन्य पश्चिमी देशों के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक यही है कि केवल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा, स्थानीय उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है।

संक्षेप में, यह संकट केवल तेल या समुद्री व्यापार का नहीं है, बल्कि आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन किस दिशा में जाएगा—इसकी झलक भी देता है। चीन ने इस स्थिति को जिस तरह अवसर में बदला है, उसने पश्चिमी देशों के लिए नई रणनीतिक चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।

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