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सऊदी अरब और UAE ने बदल दिया पाला — अब ईरान के खिलाफ अमेरिकी जंग में उतरने की तैयारी, खाड़ी में फैल सकती है महायुद्ध की आग
सऊदी अरब ने King Fahd Air Base अमेरिकी सेना को दिया, UAE दुबई में ईरानी संपत्ति फ्रीज़ करने की तैयारी में — एक सूत्र ने कहा, “सऊदी का जंग में उतरना अब सिर्फ वक्त की बात है।”
रियाद/दुबई/वाशिंगटन। खाड़ी देश अब तक दर्शक बने बैठे थे। ईरान और अमेरिका-इज़राइल की जंग को वे दूर से देख रहे थे, शांति की अपीलें कर रहे थे — लेकिन सीधे नहीं उतरे थे। वह समय अब खत्म हो रहा है।
Wall Street Journal की एक विस्फोटक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) अब ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज़राइल की जंग में सक्रिय रूप से शामिल होने की तरफ तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
सऊदी ने अपना “पुराना वादा” तोड़ा
सऊदी अरब ने अमेरिकी सेना को अपने King Fahd Air Base का इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी है — जबकि जंग शुरू होने से पहले रियाद ने साफ कह दिया था कि उसकी ज़मीन का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए नहीं होने दिया जाएगा।
सऊदी विदेशमंत्री फैसल बिन फरहान ने पिछले हफ्ते कहा था — “ईरानी हमलों पर सऊदी अरब का धैर्य असीमित नहीं है। जो भी यह समझता है कि खाड़ी देश जवाब देने में अक्षम हैं, वह गलत सोच रहा है।”
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और WSJ के एक सूत्र ने यहाँ तक कह दिया — “यह सिर्फ वक्त की बात है कि सऊदी अरब इस जंग में उतर जाए।”
UAE की वित्तीय चाल — दुबई से ईरान की नसें काटने की तैयारी
UAE — जो वर्षों से ईरानी कारोबारियों और लोगों का वित्तीय केंद्र रहा है — ने ईरानी हमलों के बाद अरबों डॉलर की ईरानी संपत्ति फ्रीज़ करने की धमकी दी है। इससे ईरान का विदेशी मुद्रा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से संपर्क लगभग खत्म हो सकता है।
दुबई में ईरानी अस्पताल और ईरानी क्लब बंद कर दिए गए हैं — UAE का कहना है कि ये संस्थाएँ IRGC से जुड़ी थीं और इनका राजनीतिक दुरुपयोग हो रहा था।
यह वही दुबई है जहाँ हज़ारों ईरानी व्यापारी रहते हैं, जहाँ ईरानी पैसा सुरक्षित रखा जाता था। अब वह “सुरक्षित ठिकाना” भी खतरे में है।
ईरान के हमलों ने बदल दी हिसाब-किताब
Princeton University में Near Eastern Studies के प्रोफेसर Bernard Haykel ने कहा — “सऊदी अरब और UAE पहले तटस्थ थे। लेकिन जब से उन पर हमले हुए, उन्हें एहसास हो गया कि वे इस कट्टरपंथी ईरानी सरकार के साथ पड़ोस में नहीं रह सकते — जो किसी भी वक्त होर्मुज़ बंद करके पूरे क्षेत्र को ब्लैकमेल कर सकती है।”

UAE अकेले 2,000 से ज़्यादा ईरानी हमले झेल चुका है। सऊदी की राजधानी रियाद और उसके ऊर्जा ढाँचे पर ईरानी मिसाइलें और ड्रोन गिरे हैं।
यह ठीक वैसा है जैसे 1990 में सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर कब्ज़ा किया था — और तब सऊदी अरब को भी अमेरिका को अपनी ज़मीन देनी पड़ी थी। इतिहास खुद को दोहरा रहा है।
होर्मुज़ में भी उतर सकते हैं खाड़ी देश
UAE के राष्ट्रपति के कूटनीतिक सलाहकार Anwar Gargash ने US Council on Foreign Relations को बताया कि UAE होर्मुज़ जलडमरूमध्य को ईरान के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अमेरिकी अभियान में शामिल हो सकता है।
होर्मुज़ — जिससे दुनिया का 20% तेल और गैस गुज़रता है — अभी ईरान की नाकेबंदी में है। अगर सऊदी और UAE भी इस मोर्चे पर उतरे, तो यह सिर्फ ईरान की जंग नहीं रहेगी — यह पूरे खाड़ी क्षेत्र की महायुद्ध बन जाएगी।
डर भी है, लेकिन…
विश्लेषकों का कहना है कि इन देशों को डर है कि अगर ट्रंप ने अचानक जंग बंद कर दी, तो वे ईरान के सामने अकेले पड़ जाएँगे। खाड़ी देश ट्रंप प्रशासन में अपनी जगह को लेकर भी नाराज़ हैं — उनके अरबों डॉलर के निवेश के बावजूद वाशिंगटन उनकी बात नहीं सुन रहा।
लेकिन जब घर पर बम गिरें, तो तटस्थता का चादर ओढ़कर बैठना मुश्किल हो जाता है।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत की दृष्टि से यह खबर बेहद अहम है। सऊदी अरब और UAE — दोनों भारत के सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता हैं। लाखों भारतीय वहाँ काम करते हैं। अगर यह जंग और फैली, तो भारतीय रेमिटेंस, तेल आयात और हमारी पेट्रोल की कीमतें — सब कुछ प्रभावित होगा।
जंग की आग अभी तेहरान में है — लेकिन उसका धुआँ दिल्ली तक पहुँच रहा है।
— दैनिक डायरी न्यूज़ डेस्क
