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होर्मुज संकट Donald Trump का “बड़ा खेल” और भारत की बढ़ती मुसीबत, अर्थशास्त्री बोले भारत निशाने पर है
दुनिया का 20% तेल जिस रास्ते से गुजरता है वो बंद है — भारत का आधा तेल और 60% गैस यहीं से आती है, सेंसेक्स धड़ाम, रुपया 92 के पार
एक संकरी सी समुद्री गली — महज 33 किलोमीटर चौड़ी। लेकिन इसी गली से दुनिया की ऊर्जा जरूरतों का 20 फीसदी हिस्सा गुजरता है। यही है होर्मुज जलडमरूमध्य — और इस वक्त यह दुनिया का सबसे खतरनाक समुद्री रास्ता बन चुका है।
ईरान की IRGC नौसेना के अधिकारी मोहम्मद अकबरजादेह ने साफ कह दिया है कि “होर्मुज जलडमरूमध्य इस वक्त पूरी तरह इस्लामिक गणराज्य की नौसेना के नियंत्रण में है।”
भारत के लिए क्यों है यह इतना खतरनाक?
भारत के लगभग आधे कच्चे तेल के आयात और करीब 60 फीसदी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती है।यानी यह सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं — यह भारत की अर्थव्यवस्था की नसों में बहने वाला खून है।
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2024 के आंकड़ों के मुताबिक इस रास्ते से गुजरने वाले कच्चे तेल का 84 फीसदी एशियाई बाजारों की तरफ जाता था। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया मिलकर इस रास्ते के कुल तेल का 69 फीसदी खपत करते हैं
बाजार में तबाही — सेंसेक्स टूटा, रुपया धड़ाम
इस संकट के चलते बुधवार को भारतीय शेयर बाजार से 9.7 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए और रुपया 92 के पार चला गया। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि यह युद्ध भारत के आम नागरिक की जेब को कितनी तेजी से काट रहा है।
ब्रेंट क्रूड 82 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गया — युद्ध शुरू होने के बाद से 13 फीसदी से ज्यादा की उछाल पेट्रोल-डीजल महंगा होने की आशंका से बाजार में सिहरन है।
ट्रंप का “होर्मुज प्लान” — जुआ या रणनीति?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा — “जरूरत पड़ने पर अमेरिकी नौसेना जल्द से जल्द होर्मुज से गुजरने वाले टैंकरों को सुरक्षा देना शुरू करेगी।” उन्होंने अमेरिकी डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन को भी निर्देश दिया कि वह खाड़ी में समुद्री व्यापार के लिए “राजनीतिक जोखिम बीमा” प्रदान करे।
लेकिन विशेषज्ञों को यह योजना आधी-अधूरी लग रही है। शिपिंग उद्योग ने इस ऐलान पर सतर्कता दिखाई — उनका कहना है कि यह योजना उस स्तर पर टैंकरों की सुरक्षा करने में सक्षम नहीं होगी जितनी जरूरत है।
यह 1980 के दशक में “टैंकर वॉर” जैसी स्थिति है — जब ईरान-इराक युद्ध के दौरान अमेरिका ने कुवैती जहाजों को सुरक्षा दी थी। लेकिन उस वक्त ईरान इतना ताकतवर नहीं था और युद्ध का दायरा इतना बड़ा नहीं था।

अर्थशास्त्री की चेतावनी — भारत निशाने पर
ऊर्जा अर्थशास्त्री अनस अलहज्जी ने कहा कि वैश्विक ऊर्जा प्रणाली “अज्ञात क्षेत्र” में प्रवेश कर चुकी है। उनका मानना है कि ट्रंप की होर्मुज योजना दरअसल एक बड़ी भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती है — और अगर अमेरिकी नौसेना टैंकर एस्कॉर्ट करने लगे, तो वैश्विक ऊर्जा अर्थशास्त्र में बदलाव आएगा जिसका भारत जैसे ऊर्जा-निर्भर देशों पर सीधा असर पड़ेगा।
यदि कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचती है, तो वैश्विक मुद्रास्फीति में 0.6 से 0.7 फीसदी की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। भारत के लिए इसका मतलब होगा — महंगाई, कमजोर रुपया, और बढ़ता व्यापार घाटा।
क्या भारत के पास कोई विकल्प है?
भारत के नीति-निर्माताओं के सामने अभी सबसे बड़ा सवाल यही है। वैकल्पिक रूट लंबे और महंगे हैं। स्ट्रैटेजिक ऑयल रिजर्व सीमित समय के लिए ही काम आ सकता है। और जब तक युद्ध चलता रहेगा, हर दिन भारत की आर्थिक चुनौती बढ़ती रहेगी।
यह वो कीमत है जो भारत उस युद्ध के लिए चुका रहा है — जो उसने शुरू नहीं किया, जिसमें वह शामिल नहीं है, लेकिन जिसका दर्द उसे भी झेलना पड़ रहा है।
