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127 साल बाद स्वदेश वापसी: PM Modi ने खोली ‘द लाइट एंड द लोटस’, पिपरहवा रत्नों की ऐतिहासिक प्रदर्शनी
भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र अवशेषों और 349 रत्नों की यह अनमोल विरासत अब दिल्ली में आम जनता के लिए खुलेगी
भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के लिए शनिवार का दिन ऐतिहासिक बन गया, जब नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में ‘द लाइट एंड द लोटस: रिलिक्स ऑफ द अवेकन्ड वन’ प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस प्रदर्शनी के केंद्र में हैं पिपरहवा रत्न, जो 127 वर्षों बाद भारत वापस लौटे हैं।
ये वही पवित्र बौद्ध अवशेष हैं जिन्हें 1898 में एक अंग्रेज अधिकारी द्वारा उत्तर प्रदेश के पिपरहवा स्तूप से बाहर ले जाया गया था। संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, यह वापसी केवल वस्तुओं की नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक स्मृति और वैश्विक बौद्ध समुदाय की आस्था की भी है।
क्या है ‘द लाइट एंड द लोटस’ प्रदर्शनी
नई दिल्ली के राय पीठोरा सांस्कृतिक परिसर में आयोजित इस प्रदर्शनी में भगवान बुद्ध से जुड़े अवशेषों के साथ-साथ 88 अन्य प्राचीन वस्तुओं की इमर्सिव प्रस्तुति की गई है। इसमें खुदाई स्थल का मॉडल, प्रत्यावर्तन (रीपैट्रिएशन) गैलरी और ऐतिहासिक विवरण भी शामिल हैं। रविवार से यह प्रदर्शनी आम लोगों के लिए खोल दी गई है।
पिपरहवा रत्न क्या हैं
पिपरहवा रत्नों में कुल 349 बहुमूल्य रत्न शामिल हैं, जिन्हें 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने खोजा था। यह खोज उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर ज़िले के पिपरहवा गांव में स्थित एक प्राचीन बौद्ध स्तूप से हुई थी, जो नेपाल सीमा के पास है।
नीलम, माणिक, पुखराज, मोती और सोने की सजावटी पत्तियों जैसे ये रत्न उस समय भारतीय ख़ज़ाना क़ानून 1878 के तहत ब्रिटिश क्राउन के नियंत्रण में चले गए थे। बड़ी संख्या में रत्न आज भी कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं, लेकिन खोज का एक हिस्सा पेप्पे परिवार के पास रहा।
नीलामी से वापसी तक का सफर
2025 में जब इन रत्नों को Sotheby’s के हांगकांग प्लेटफॉर्म पर नीलामी के लिए रखा गया, तब भारत सरकार हरकत में आई। संस्कृति मंत्रालय ने कानूनी नोटिस जारी कर नीलामी तत्काल रोकने और अवशेषों को भारत लौटाने की मांग की।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और हांगकांग स्थित भारतीय दूतावास ने भी इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई। भारत का तर्क साफ था—ये अवशेष न तो बिकाऊ हैं और न ही निजी संपत्ति, बल्कि भारत और वैश्विक बौद्ध समुदाय की साझा धरोहर हैं।

उद्योगपति की अहम भूमिका
इस पूरी प्रक्रिया में एक दिलचस्प मोड़ तब आया, जब भारतीय उद्योगपति पिरोजशा गोडरेज ने 349 रत्नों का पूरा संग्रह एक अघोषित राशि में खरीद लिया। इसके बाद उन्होंने इसे भारत सरकार को सौंपने और राष्ट्रीय संग्रहालय को पांच वर्षों के लिए ऋण पर देने का फैसला किया।
यह कदम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे सरकार को किसी व्यावसायिक लेन-देन में शामिल नहीं होना पड़ा और नैतिक सवालों से बचाव हुआ।
केवल प्रदर्शनी नहीं, सांस्कृतिक संदेश
पिपरहवा रत्नों की वापसी और यह प्रदर्शनी केवल अतीत की कहानी नहीं कहती, बल्कि यह संदेश देती है कि भारत अपनी खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने के लिए कितनी गंभीरता से प्रयास कर रहा है। गौतम बुद्ध से जुड़े ये अवशेष आज भी शांति, करुणा और ज्ञान के मूल्यों की याद दिलाते हैं।
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