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Bollywood

‘Bhoot Bangla’ क्यों नहीं जगा पाई Akshay-Priyadarshan की पुरानी जादूगरी?

नीरज वोरा की कमी ने तोड़ी कॉमेडी की रीढ़, हॉरर-कॉमेडी में दिखी अधूरी चमक

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अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की ‘भूत बंगला’ में नजर आई कमजोर कॉमेडी का असर

बॉलीवुड में जब भी कॉमेडी की बात होती है, तो अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी का नाम सबसे पहले आता है। ‘हेरा फेरी’, ‘गरम मसाला’ और ‘भूल भुलैया’ जैसी फिल्मों ने दर्शकों को हंसी से लोटपोट कर दिया था। ऐसे में जब लंबे समय बाद ‘भूत बंगला’ के जरिए यह जोड़ी फिर साथ आई, तो उम्मीदें आसमान पर थीं। लेकिन फिल्म दर्शकों की उन उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी।

इस बार जो सबसे बड़ी कमी खली, वह थी दिवंगत लेखक नीरज वोरा की अनुपस्थिति। नीरज वोरा सिर्फ एक लेखक नहीं थे, बल्कि अक्षय-प्रियदर्शन की कॉमिक दुनिया के अहम स्तंभ थे। उनकी लिखी स्क्रिप्ट और संवाद ही इन फिल्मों की असली ताकत हुआ करते थे।

‘भूत बंगला’ की कहानी का ढांचा काफी हद तक ‘भूल भुलैया’ जैसा नजर आता है—पहले हाफ में हल्की-फुल्की कॉमेडी और दूसरे हिस्से में हॉरर का बढ़ता प्रभाव। लेकिन जहां ‘भूल भुलैया’ में डर और हंसी का संतुलन शानदार था, वहीं ‘भूत बंगला’ में यह तालमेल कमजोर पड़ता दिखता है।

फिल्म में कलाकारों की टोली भी कुछ जानी-पहचानी लगती है। राजपाल यादव, परेश रावल और मनोज जोशी जैसे कलाकारों की मौजूदगी से कॉमेडी की उम्मीद बढ़ती है, लेकिन स्क्रिप्ट के अभाव में उनका असर सीमित रह जाता है। दिलचस्प बात यह भी है कि फिल्म की शूटिंग जयपुर के चोमू पैलेस में हुई है, जो पहले भी ‘भूल भुलैया’ के लिए इस्तेमाल किया जा चुका है।

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अगर तुलना की जाए, तो ‘भूल भुलैया’ ने न सिर्फ एक नई हॉरर-कॉमेडी शैली को जन्म दिया था, बल्कि बाद में इसका फ्रेंचाइज़ भी बना। वहीं ‘भूत बंगला’ उस स्तर की पकड़ और यादगार पल देने में असफल दिखती है।

कई फिल्म समीक्षक मानते हैं कि कॉमेडी सिर्फ अच्छे कलाकारों या बड़े नामों से नहीं बनती, बल्कि मजबूत लेखन उसका आधार होता है। ‘भूत बंगला’ इस बात का ताजा उदाहरण है कि अगर कहानी और संवाद दमदार न हों, तो बड़ी से बड़ी जोड़ी भी फीकी पड़ सकती है।

अंत में कहा जा सकता है कि ‘भूत बंगला’ एक अधूरी कोशिश लगती है—जहां सब कुछ होते हुए भी कुछ जरूरी कमी रह गई। और वह कमी थी नीरज वोरा की कलम की।

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