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Pakistan में 21 घंटे की बातचीत बेनतीजा — Iran का आरोप, Netanyahu के फोन ने पलट दी पूरी बाज़ी
Islamabad में हुई Iran-US high-level वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। Iran के Foreign Minister का दावा है कि Israel के PM Netanyahu ने बीच बातचीत में VP JD Vance को फोन करके पूरा माहौल बदल दिया।
कूटनीति की दुनिया में कभी-कभी 21 घंटे की मेहनत भी बेकार चली जाती है। Pakistan की मेज़बानी में हुई Iran और America के बीच की यह ऐतिहासिक बातचीत भी कुछ ऐसी ही रही। मैराथन वार्ता के बाद भी कोई समझौता नहीं हुआ, और अब इसके पीछे जो कारण सामने आ रहे हैं, वे और भी चौंकाने वाले हैं।
Netanyahu का फोन और बदलता खेल
Iran के Foreign Minister Seyed Abbas Araghchi ने एक बड़ा दावा किया है। उनके अनुसार बातचीत के दौरान Israel के Prime Minister Benjamin Netanyahu ने US Vice President JD Vance को फोन किया, और उस एक फोन ने पूरी बातचीत की दिशा बदल दी।
Araghchi ने कहा, “Netanyahu के उस फोन ने US-Iran वार्ता के केंद्र को हटाकर Israel के हितों की तरफ मोड़ दिया। America ने वार्ता की मेज़ पर वह हासिल करने की कोशिश की जो वह युद्ध से नहीं कर सका।”
यह आरोप अगर सच है, तो यह दुनिया की सबसे संवेदनशील diplomatic बातचीत में बाहरी दखल का एक गंभीर मामला बनता है। हालाँकि Washington ने अब तक इन आरोपों पर कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया है।
1979 के बाद पहली बार आमने-सामने
इस वार्ता की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि 1979 की Islamic Revolution के बाद यह पहला मौका था जब Iran और America के बीच इस स्तर की सीधी और आमने-सामने की बातचीत हुई। यानी लगभग 46 साल की खामोशी के बाद दोनों देश एक मेज़ पर बैठे थे।
यह वार्ता उस 2 हफ्ते के ceasefire के चार दिन बाद हुई जो West Asia में बढ़ते तनाव को थामने के लिए घोषित किया गया था। इससे पहले 28 फरवरी को America और Israel ने Iran पर military strikes किए थे, जिसने पूरे region की स्थिरता को हिला दिया था और global energy markets पर भी असर पड़ा था।
JD Vance ने कहा “यह हमारा आखिरी और सबसे बेहतर प्रस्ताव था”
American delegation की अगुआई कर रहे JD Vance Islamabad से बिना किसी deal के रवाना हो गए। जाने से पहले उन्होंने press conference में कहा कि America ने अपना “final and best offer” पेश कर दिया था। उनके अनुसार Iran का nuclear enrichment पर रुख ही सबसे बड़ी रुकावट बना।
Iran की तरफ से Araghchi ने Vance की इस press conference को “ज़रूरत से ज़्यादा और अनावश्यक” करार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि Iran ने “पूरी नेकनीयती” के साथ इस वार्ता में हिस्सा लिया और Tehran अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए “प्रतिबद्ध और तैयार” है।
यह कुछ वैसा ही है जैसे Cold War के दौर में America और Soviet Union के बीच arms limitation talks बार-बार किसी न किसी बाहरी दबाव में टूट जाती थीं।

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Iran के Parliament Speaker ने कहा, “भरोसा नहीं जीत पाया America”
Tehran की delegation की अगुआई कर रहे Iranian Parliament Speaker Mohammad Bagher Ghalibaf ने बातचीत के बाद अपना बयान दिया। उन्होंने कहा, “Iranian delegation ने forward-looking initiatives पेश किए, लेकिन दूसरा पक्ष हमारा भरोसा जीतने में नाकाम रहा।”
Ghalibaf ने यह भी जोड़ा, “दो पिछले युद्धों के अनुभवों की वजह से हमें सामने वाले पक्ष पर भरोसा नहीं है।” यह बयान बताता है कि यह सिर्फ nuclear programme का मुद्दा नहीं है, बल्कि दशकों पुराने अविश्वास की एक गहरी खाई है जो इतनी आसानी से पाटी नहीं जा सकती।
उन्होंने कहा कि Iran अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए “diplomacy of power” और military capability दोनों को साथ लेकर चलेगा।
Pakistan की तारीफ, लेकिन नतीजा शून्य
Ghalibaf ने Pakistan को इस संवेदनशील वार्ता की मेज़बानी के लिए धन्यवाद दिया और Iranian negotiators और आम जनता के समर्थन की सराहना की। Pakistan ने इस पूरी प्रक्रिया में एक neutral और ज़िम्मेदार मेज़बान की भूमिका निभाई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच की खाई को पाटना उसके बस में नहीं था।
आगे क्या?
फिलहाल तनाव कम होने के कोई संकेत नहीं हैं। Iran का nuclear programme अब भी विवाद के केंद्र में है। America पर Israel के प्रभाव के आरोप diplomatic circles में गूँज रहे हैं। और West Asia में ceasefire कितने दिन टिकेगा, यह देखना बाकी है।
यह वार्ता इतिहास में उस मौके के रूप में दर्ज हो सकती है जब दुनिया एक बड़े टकराव से बचते-बचते रह गई, लेकिन एक phone call ने शायद बहुत कुछ बदल दिया।
