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Rubber की कीमतें 80% उछलीं — Tyre से लेकर रोजमर्रा के सामान तक महंगाई की आहट, उद्योग ने सरकार से माँगी मदद
Synthetic Rubber की कीमत ₹200/kg से बढ़कर ₹360-370/kg तक पहुँची — AIRIA ने सरकारी मंत्रालयों को लिखा पत्र, MSME सबसे ज्यादा संकट में
अगर आप सोच रहे हैं कि आने वाले दिनों में आपकी गाड़ी के Tyre, Auto Parts या रोज़मर्रा के रबर उत्पाद महंगे क्यों हो रहे हैं — तो इसकी जड़ें एक बड़े कच्चे माल के संकट में छुपी हैं। India का Rubber Manufacturing Sector इस वक्त एक गहरे Cost Shock से गुजर रहा है और इसका असर धीरे-धीरे आम आदमी की जेब तक पहुँचने वाला है।
80% उछाल — कैसे हुआ यह सब?
Synthetic Rubber की कीमतें करीब ₹200 प्रति किलो से बढ़कर ₹360-370 प्रति किलो तक पहुँच गई हैं — यानी लगभग 80% की बढ़ोतरी। यह कोई सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं है।
All India Rubber Industries Association (AIRIA) के Vice President Vinod Bansal ने NDTV Profit से बात करते हुए साफ कहा — “यह बढ़ोतरी सिर्फ Synthetic Rubber तक सीमित नहीं है। Carbon, Oil, Chemicals — लगभग हर चीज़ Crude से जुड़ी है। इस बार बढ़ोतरी असंतुलित रही है क्योंकि Supply Chains बुरी तरह बाधित हो गई हैं।”
दरअसल, Synthetic Rubber बनाने में Styrene और Butadiene जैसे Crude-linked Inputs का इस्तेमाल होता है। भले ही India में Reliance Industries और Indian Oil Corporation जैसी कंपनियाँ SBR (Styrene-Butadiene Rubber) बनाती हैं, लेकिन इनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार से तय होती हैं।
Import पर निर्भरता — यहाँ भी बड़ा संकट
Nitrile Rubber की बात करें तो India में सिर्फ 17,000-18,000 टन का उत्पादन होता है जबकि माँग करीब 60,000 टन है। यानी 70% से ज्यादा ज़रूरत Import से पूरी होती है। ऐसे में जब Global Supply Chain डगमगाती है तो भारत पर इसका सीधा असर पड़ता है।
Bansal ने बताया — “यह सिर्फ कीमत का मसला नहीं है। उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है। माल को Ration किया जा रहा है और Traders Stock रखने से कतरा रहे हैं।”
Tyre Companies बनाम MSME — दो अलग दुनिया
इस पूरे संकट में दो वर्ग अलग-अलग तरीके से प्रभावित हो रहे हैं।
बड़ी Tyre Companies जो कुल Rubber Consumption का करीब 70% इस्तेमाल करती हैं, उनके पास OEM Contracts में Pricing Mechanism होता है जिससे वे धीरे-धीरे बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डाल सकती हैं। पहले ही 1-4% तक के Price Hike किए जा चुके हैं और विश्लेषकों का मानना है कि अगर Input Prices ऊँचे बने रहे तो और बढ़ोतरी होगी। Tyre Companies की कुल Production Cost का 60-70% हिस्सा Commodity-linked है — यानी Raw Material पहले से ही 15-20% महंगा हो चुका है।
लेकिन छोटे Rubber Product Manufacturers — खासकर MSMEs — की स्थिति कहीं ज्यादा मुश्किल है। Bansal ने कहा — “बहुत से MSMEs के लिए लागत को आगे पास करना बेहद मुश्किल है, खासकर Open Market में। असली संकट यहीं है।”
नतीजा यह है कि जहाँ Pass-through संभव है वहाँ धीरे-धीरे कीमतें बढ़ रही हैं और जहाँ नहीं हो सकता वहाँ Production कट हो रही है। Bansal ने बताया — “OEM को Supply करने वाले जारी रखेंगे, लेकिन Open Market में जहाँ घाटा हो रहा है वहाँ कई लोग Production बंद कर रहे हैं।”
Working Capital का संकट — MSME सबसे ज्यादा पीड़ित
80% की Cost बढ़ोतरी का मतलब है कि उतने ही उत्पादन के लिए अब कहीं ज्यादा पूँजी चाहिए। लेकिन Revenue Adjustment तुरंत नहीं होता।
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Bansal ने समझाया — “OEM Supplies में Pricing 6 महीने के Average पर आधारित होती है। लागत तुरंत बढ़ जाती है लेकिन Revenue बाद में Adjust होता है। यही Gap सबसे बड़ी समस्या बन रही है।”
AIRIA ने सरकार को लिखा पत्र
AIRIA ने सरकारी मंत्रालयों को औपचारिक पत्र लिखकर हस्तक्षेप की माँग की है। उद्योग चाहता है:
- Working Capital की सीमा बढ़ाई जाए
- Loan Restructuring के लिए तेज़ तंत्र बनाया जाए
- COVID काल जैसी अस्थायी राहत दी जाए
Bansal ने RBI की राहत नीतियों पर भी सवाल उठाया — “कुछ क्षेत्रों को छूट मिली है लेकिन Rubber Industry को समान लाभ नहीं मिला।” उन्होंने कहा — “यह एक असाधारण स्थिति है और इसे अलग तरीके से देखा जाना चाहिए।”

आगे की राह — राहत मिलेगी, लेकिन जोखिम बने रहेंगे
उद्योग को उम्मीद है कि अगर Geopolitical Tensions अगले 2-3 हफ्तों में शांत हुए तो कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन Natural Rubber की कीमतें भी बढ़ रही हैं और Demand, Supply से आगे निकलने वाली है। देश का 80-85% Natural Rubber उत्पादन Kerala में होता है — जहाँ Monsoon से जुड़े जोखिम हमेशा बने रहते हैं।
Bansal ने चेतावनी दी — “अगर यही हाल रहा तो Natural Rubber की कीमतें भी तेज़ी से उछल सकती हैं।”
10-12 प्रमुख Synthetic Rubber Variants पूरी तरह Import पर निर्भर हैं। ऐसे में Global Disruption का खतरा बना रहेगा।
Bansal ने अंत में कहा — “कंपनियाँ Production घटाकर और Liquidity बचाकर काम चला रही हैं। लेकिन अगर समय पर सरकारी मदद नहीं मिली तो MSMEs के लिए यह संकट बहुत गहरा हो जाएगा।”
