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अप्रैल में तेल संकट होगा दोगुना यूरोप भी नहीं बचेगा, IEA प्रमुख की सबसे बड़ी चेतावनी
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख फतेह बिरोल बोले — यह संकट 1970 के दशक के दो तेल झटकों और रूस-यूक्रेन गैस संकट को मिलाकर भी बड़ा है; भारत में भी महंगाई की आहट
नई दिल्ली/जिनेवा। याद करिए 2022 का वो दौर जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप में गैस की किल्लत से लोग सर्दियों में ठिठुरने लगे थे। या फिर 1973 का वो काला साल जब अरब देशों ने तेल प्रतिबंध लगाया था और पूरी दुनिया में पेट्रोल के लिए लंबी-लंबी कतारें लग गई थीं। अब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख कह रहे हैं कि आज का संकट उन सबको मिलाकर भी पीछे छोड़ देता है — और अप्रैल में यह और भी भयावह होने वाला है।
IEA के कार्यकारी निदेशक फतेह बिरोल ने साफ चेतावनी दी है कि अप्रैल का महीना मार्च से कहीं ज्यादा बुरा होगा। उन्होंने कहा कि मार्च में जो तेल और गैस के कार्गो जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से युद्ध शुरू होने से पहले निकले थे, वे अभी बंदरगाहों तक पहुंच रहे हैं — लेकिन अप्रैल में ऐसा कुछ नहीं है। “अप्रैल में तेल का नुकसान मार्च के मुकाबले दोगुना होगा,” बिरोल ने कहा।
इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट
बिरोल ने ऑस्ट्रेलिया के नेशनल प्रेस क्लब में कहा कि दुनिया अभी 1970 के दशक के दोनों तेल झटकों और रूस के 2022 के यूक्रेन हमले के बाद आए गैस संकट को मिलाकर भी बड़े संकट का सामना कर रही है। उन्होंने इसे “दो तेल संकट और एक गैस संकट — सब एक साथ” करार दिया।
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सीधी भाषा में कहें तो — जैसे किसी घर में एक साथ बिजली, पानी और गैस तीनों बंद हो जाएं।
बिरोल ने यह भी बताया कि संघर्ष और होर्मुज की नाकेबंदी से जो गैस आपूर्ति बाधित हुई है, वह रूसी गैस बंद होने से हुए नुकसान से भी ज्यादा है। “हम एक बड़े, बहुत बड़े व्यवधान की तरफ बढ़ रहे हैं — और यह इतिहास का सबसे बड़ा संकट होगा,” उन्होंने कहा।
जेट फ्यूल और डीजल — सबसे बड़ी मार
बिरोल ने बताया कि फिलहाल सबसे बड़ी दिक्कत जेट फ्यूल और डीजल की कमी है। यह समस्या अभी एशिया में दिखनी शुरू हो गई है और अप्रैल तक यूरोप को भी इसका सामना करना पड़ेगा।
मतलब साफ है — हवाई यात्रा महंगी होगी, माल ढुलाई बाधित होगी और आम आदमी की जेब पर सीधी चोट पड़ेगी।
यूरोप की तैयारी और आपातकालीन भंडार
यूरोपीय आयोग के ऊर्जा आयुक्त डैन योर्गेनसेन ने यूरोपीय देशों से तेल और गैस की खपत कम करने और विकल्प तलाशने का आग्रह किया है। ब्रसेल्स की एक आपात बैठक में 11 मिलियन बैरल प्रतिदिन के तेल की वैश्विक कमी को संबोधित किया गया।

संघर्ष ने ब्रेंट क्रूड को $119 प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है — जो युद्ध से पहले करीब $70 था। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अनिश्चित परिस्थितियों में यह $200 तक भी जा सकता है।
भारत पर असर — चुप मत रहिए
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। होर्मुज बंद रहने से भारत को भी विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमतें, खाद महंगी होने से खेती की लागत, और हवाई टिकटों के दाम — सब पर इस संकट की परछाईं पड़ रही है।
IEA का अगला कदम
बिरोल ने बताया कि IEA अपने रणनीतिक तेल भंडार की एक और बड़ी रिलीज पर विचार कर रही है। “हम बाजार का आकलन हर घंटे कर रहे हैं। अगर जरूरत पड़ी तो हम और भंडार जारी करने का सुझाव देंगे,” उन्होंने कहा।
दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां अगर होर्मुज जल्द नहीं खुला, तो अप्रैल का महीना इतिहास के सबसे महंगे महीनों में से एक बन सकता है — और इसकी आंच भारत के हर रसोई घर तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी।
