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ईरान में सत्ता परिवर्तन क्यों है लगभग नामुमकिन? अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने खोला बड़ा राज़

अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े हमले किए, खामेनेई की मौत भी हुई — फिर भी CIA की रिपोर्ट कह रही है कि शासन बदलना इतना आसान नहीं

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अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट: ईरान में सत्ता परिवर्तन मुश्किल, जानें 5 बड़े कारण | Dainik Diary
अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के अनुसार ईरान में बड़े सैन्य हमले के बावजूद सत्ता परिवर्तन आसान नहीं — विशेषज्ञों ने जताई लंबे युद्ध की आशंका।

दुनिया की सबसे ताकतवर फौजी शक्ति — अमेरिका — ने जब ईरान पर हमला किया, तो दुनिया को लगा कि शायद अब वहाँ का तख्तापलट तय है। लेकिन अमेरिका की खुद की खुफिया एजेंसियाँ कुछ और ही कह रही हैं। नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल की एक गोपनीय रिपोर्ट सामने आई है जिसमें साफ लिखा है — “बड़े से बड़े सैन्य हमले के बाद भी ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना बेहद कम है।”

यह रिपोर्ट तब आई है जब अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो चुकी है। तेहरान, इस्फहान, क़ोम जैसे बड़े शहरों में हज़ारों सैन्य और सरकारी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इसके बावजूद विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ईरान का शासन तंत्र इतनी आसानी से नहीं टूटेगा।

आखिर क्यों इतना मुश्किल है ईरान में बदलाव?

शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉबर्ट पेप, जो पिछले तीन दशकों से हवाई हमलों का अध्ययन कर रहे हैं, उनका कहना है कि “पिछले एक सदी में किसी भी देश ने सिर्फ हवाई हमलों से किसी सरकार को नहीं गिराया है — यह इतिहास का सच है।” उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यही रणनीति जारी रही तो यह युद्ध लंबा खिंच सकता है और मध्य-पूर्व से बाहर भी फैल सकता है।

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ईरान की ताकत सिर्फ एक नेता में नहीं बसी है। वहाँ IRGC यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स नाम की एक समानांतर सेना है, जिसका काम ही शासन की रक्षा करना है। धार्मिक नेतृत्व की कई परतें हैं, अर्थव्यवस्था पर उनकी मजबूत पकड़ है, और सबसे अहम — ईरानी जनता का एक बड़ा हिस्सा इस हमले को “अपने देश पर आक्रमण” के रूप में देख रहा है।

खामेनेई की मौत के बाद क्या हुआ?

जब खामेनेई की मौत की खबर आई तो ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि “यह ईरानी जनता के लिए अपना देश वापस लेने का सबसे बड़ा मौका है।” लेकिन हकीकत यह है कि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्किान ने बदले की कसम खाई, IRGC ने “इतिहास का सबसे बड़ा हमला” करने की घोषणा की, और इजरायल-अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागी गईं।

इजरायल की खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख अमोस यादलिन ने CBS News को बताया कि “इजरायल सरकार या सेना में कोई भी समझदार इंसान नहीं मानता कि इस वक्त ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव है।”

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अमेरिकी इंटेलिजेंस और ट्रंप में मतभेद

एक दिलचस्प बात यह है कि खुद ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के बीच गहरा मतभेद है। ट्रंप ने कहा कि ईरान के पास अमेरिका तक मिसाइलें मारने की क्षमता थी, लेकिन अमेरिकी इंटेलिजेंस के अनुसार ईरान को यह क्षमता हासिल करने में 2035 तक का वक्त लगता। यानी करीब नौ साल बाद। डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेगसेथ ने भी सफाई दी कि “यह कोई सत्ता परिवर्तन वाला युद्ध नहीं है।”

ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूट जैसे थिंक-टैंक का कहना है कि यह युद्ध “शुरू तो आसान था लेकिन इसका अंजाम बेहद जटिल होगा।” ईरान भले ही परमाणु और मिसाइल क्षमता में कमजोर हो गया हो, लेकिन उसके प्रॉक्सी संगठन — जो 9 से ज्यादा देशों में फैले हैं — अभी भी सक्रिय हैं।

भारत पर क्या असर?

यह संघर्ष भारत के लिए भी चिंता की बात है। ईरान से भारत का तेल आयात और चाबहार बंदरगाह परियोजना दाँव पर है। यदि युद्ध लंबा खिंचा तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जिसका सीधा असर भारतीय आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।

फिलहाल दुनिया की नज़रें ईरान पर टिकी हैं — एक ऐसे देश पर जो झुकने को तैयार नहीं, और एक ऐसे युद्ध पर जिसका अंत किसी को नहीं पता।

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