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साइटस्क्रीन के पास बैठा ‘कोच’ पिता: Abhishek Sharma के हर छक्के के पीछे छिपे इशारे
135 रन की पारी के बाद भी बेटे की नजर भीड़ में सिर्फ एक चेहरे को खोजती है
हैदराबाद की उस रात जब अभिषेक शर्मा ने 68 गेंदों में 135 रन ठोक दिए, स्टेडियम शोर से गूंज रहा था। हर तरफ तालियां, हर तरफ जश्न। लेकिन इस शोर के बीच भी अभिषेक की नजर किसी और को ढूंढ रही थी—साइटस्क्रीन के पास बैठे अपने पिता को।
मैच खत्म होने के बाद जब उनके हाथ में माइक आया, तो उन्होंने एक बेहद भावुक बात साझा की। उन्होंने बताया कि बचपन से लेकर आज तक उनके पिता हर मैच में एक ही जगह बैठते हैं—साइटस्क्रीन के पास। और यह सिर्फ देखने के लिए नहीं, बल्कि इशारों में उन्हें गाइड करने के लिए।
अभिषेक कहते हैं कि जब भी वह नॉन-स्ट्राइकर एंड पर खड़े होते हैं, उनके पिता हाथों के छोटे-छोटे संकेतों से बताते हैं कि अगली गेंद कैसे खेलनी है। यह रिश्ता सिर्फ पिता-पुत्र का नहीं, बल्कि एक कोच और खिलाड़ी का भी है।
क्रिकेट में अक्सर हम बड़े कोच, हाई-टेक एनालिसिस और ड्रेसिंग रूम की रणनीतियों की बात करते हैं। लेकिन अभिषेक की कहानी हमें याद दिलाती है कि असली नींव घर से ही बनती है।

उनके पिता राज कुमार शर्मा का यह जुनून नया नहीं है। अंडर-12 के दिनों से ही वह हर मैच में उसी जगह बैठते आ रहे हैं। समय बदला, स्टेडियम बदले, लेकिन उनकी सीट नहीं बदली। यह एक तरह की परंपरा बन चुकी है—जहां से वह अपने बेटे के खेल को पढ़ते हैं और उसे बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं।
क्रिकेट के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहां परिवार का योगदान खिलाड़ी के करियर को आकार देता है। जैसे सचिन तेंदुलकर के भाई अजीत ने उनके करियर को दिशा दी, या विराट कोहली के पिता ने मुश्किल हालात में भी उनका हौसला बढ़ाया। उसी कड़ी में अब अभिषेक शर्मा और उनके पिता की कहानी भी जुड़ गई है।
यह सिर्फ एक शानदार पारी की कहानी नहीं है, बल्कि उस भरोसे की कहानी है जो स्टैंड से मैदान तक चलता है। अभिषेक ने खुद कहा कि वह चाहते हैं कि अगली बार कैमरा उनके पिता पर जाए, ताकि दुनिया देख सके कि उनके असली ‘कोच’ कौन हैं।
आज जब क्रिकेट ग्लैमर और टेक्नोलॉजी से भरा हुआ है, ऐसी कहानियां इसे और भी मानवीय बना देती हैं। क्योंकि हर बड़े छक्के के पीछे सिर्फ ताकत नहीं, बल्कि किसी अपने का विश्वास भी होता है।
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