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‘Assi’ में नहीं है मसाला, सिर्फ सच्चाई: Anurag Sinha’s की फिल्म पर छिड़ी बहस
रेप और विजिलांटे जस्टिस जैसे कठिन मुद्दों को बिना समझौते के दिखाने की कोशिश, दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती फिल्म
बॉलीवुड में जहां अक्सर मनोरंजन को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं निर्देशक अनुराग सिन्हा ने अपनी नई फिल्म ‘अस्सी’ के जरिए एक बार फिर गंभीर और असहज कर देने वाले विषय को उठाया है। यह फिल्म ना तो हल्की-फुल्की है और ना ही इसमें पारंपरिक मसालेदार तत्व हैं। खुद निर्देशक का कहना है कि ‘अस्सी’ उनकी सबसे “कम चीज़ी” फिल्म है—यानि इसमें मनोरंजन कम और सच्चाई ज्यादा है।
पिछले कुछ वर्षों में अनुराग सिन्हा ने ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल 15’, ‘थप्पड़’, ‘अनेक’ और ‘भीड़’ जैसी फिल्मों के जरिए समाज के ज्वलंत मुद्दों को बड़े पर्दे पर उतारा है। ‘अस्सी’ इसी कड़ी का अगला पड़ाव है, जो रेप जैसे संवेदनशील विषय को केंद्र में रखती है।
फिल्म की कहानी कोर्टरूम ड्रामा के रूप में आगे बढ़ती है, लेकिन इसका भावनात्मक और सामाजिक असर इससे कहीं ज्यादा गहरा है। यह फिल्म सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं कहती, बल्कि उस मानसिकता को भी उजागर करती है, जो ऐसे अपराधों को जन्म देती है। खास बात यह है कि फिल्म में युवा पीढ़ी को इस ट्रॉमा के केंद्र में रखा गया है, जिससे इसकी गंभीरता और भी बढ़ जाती है।

अनुराग सिन्हा का मानना है कि समाज में बढ़ती विजिलांटे जस्टिस—यानि कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति—पर चर्चा करना बेहद जरूरी है। ‘अस्सी’ इसी सवाल को उठाती है कि क्या न्याय की प्रक्रिया पर भरोसा खत्म हो रहा है? और अगर हां, तो इसके परिणाम क्या हो सकते हैं?
फिल्म का ट्रीटमेंट कई जगहों पर दर्शकों को असहज कर सकता है। कुछ सीन इतने कड़े हैं कि उन्हें देखना आसान नहीं, लेकिन शायद यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी है। यह दर्शकों को सिर्फ मनोरंजन नहीं देती, बल्कि उन्हें सोचने पर मजबूर करती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 12 लाख दर्शकों ने इस फिल्म को देखा है—जो इस बात का संकेत है कि भले ही फिल्म “डिस्टर्बिंग” हो, लेकिन लोग ऐसे विषयों पर बनी फिल्मों को नजरअंदाज नहीं कर रहे।
आज के दौर में जब कंटेंट का स्तर तेजी से बदल रहा है, ‘अस्सी’ जैसी फिल्में यह साबित करती हैं कि सिनेमा सिर्फ एंटरटेनमेंट का जरिया नहीं, बल्कि समाज का आईना भी हो सकता है।
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