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असम में टूटा गठबंधन फिर जुड़ा: ‘दो गोगोई’ साथ आए, चुनावी तस्वीर बदलने के संकेत
गौरव गोगोई और अखिल गोगोई ने सीट शेयरिंग पर बनाई सहमति, विधानसभा चुनाव साथ लड़ने का ऐलान
असम की राजनीति में एक बड़ा मोड़ देखने को मिला है, जहां लंबे समय से टूटते-जुड़ते रिश्तों के बाद आखिरकार Gaurav Gogoi और Akhil Gogoi ने एक बार फिर हाथ मिला लिया है। Indian National Congress और Raijor Dal ने आगामी असम विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ने का ऐलान किया है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ ही हफ्ते पहले दोनों दलों के बीच बातचीत टूटने की खबरें सामने आई थीं। सीट बंटवारे को लेकर मतभेद इतने बढ़ गए थे कि गठबंधन लगभग खत्म माना जा रहा था। लेकिन अब देर रात हुई घोषणा ने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं।
दोनों नेताओं ने साथ आकर न सिर्फ समझौते की पुष्टि की, बल्कि पारंपरिक असमिया अंदाज में गमछा (गमोसा) का आदान-प्रदान कर एकता का संदेश भी दिया। इस मौके पर अखिल गोगोई ने यहां तक कहा कि उनकी पार्टी गौरव गोगोई को अगला मुख्यमंत्री बनाने के लिए काम करेगी।
सीट शेयरिंग का फॉर्मूला क्या है?
इस नए समझौते के तहत राइजोर दल को 13 सीटें दी गई हैं। इनमें से 2 सीटें—गौरिपुर और गोलपाड़ा ईस्ट—ऐसी होंगी जहां दोनों दल “फ्रेंडली कॉन्टेस्ट” करेंगे।
बाकी 11 सीटों में कुछ खास सीटें भी शामिल हैं, जो पहले विवाद का कारण बनी थीं। इनमें ढिंग सीट सबसे अहम है, जिस पर पहले दोनों दलों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। इसके अलावा मरघेरिटा सीट भी चर्चा में है, जहां कांग्रेस उम्मीदवार ने आखिरी समय में अपना नाम वापस ले लिया।

शिवसागर सीट से खुद अखिल गोगोई फिर से चुनाव मैदान में उतरेंगे, जिससे यह सीट एक बार फिर हाई-प्रोफाइल मुकाबले में बदल सकती है।
क्यों खास है यह गठबंधन?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह गठबंधन सिर्फ सीटों का समझौता नहीं, बल्कि असम की विपक्षी राजनीति को एकजुट करने की कोशिश है।
पिछले कुछ सालों में असम में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के बीच तालमेल की कमी साफ दिखाई दी है। ऐसे में यह नया गठबंधन आगामी चुनावों में सत्तारूढ़ दल को कड़ी चुनौती दे सकता है।
क्या बदलेगा चुनावी समीकरण?
इस गठबंधन से यह साफ संकेत मिलता है कि विपक्ष अब बिखराव से बाहर निकलकर एक मजबूत रणनीति बनाना चाहता है। खासकर युवा और स्थानीय मुद्दों पर आधारित राजनीति को आगे बढ़ाने में यह साझेदारी अहम साबित हो सकती है।
हालांकि, राजनीति में गठबंधन जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही जल्दी टूट भी सकते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नई दोस्ती चुनाव तक कितनी मजबूत रहती है और मतदाताओं पर इसका कितना असर पड़ता है।
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