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ओबामा की गलती से ईरान बना परमाणु ताकत Donald Trump का बड़ा दावा!
ट्रंप ने कहा — अगर मैंने JCPOA रद्द न किया होता, तो ईरान के पास आज से तीन साल पहले ही होता परमाणु बम
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी बराक ओबामा पर निशाना साधते हुए नजर आए। ट्रंप ने दावा किया कि अगर उन्होंने 2018 में ओबामा के जमाने में हुए ईरान परमाणु समझौते — जिसे JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) कहा जाता है — को रद्द नहीं किया होता, तो आज ईरान के पास परमाणु हथियार होता। और वो भी तीन साल पहले।
ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है।
आखिर क्या था यह JCPOA समझौता?
साल 2015 में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की अगुवाई में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने मिलकर ईरान के साथ एक परमाणु डील की थी। इस डील के तहत ईरान ने वादा किया था कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए और अरबों डॉलर की संपत्ति अनफ्रीज की गई।
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ट्रंप ने इसे हमेशा से “इतिहास की सबसे बुरी डील” कहा। जब वे 2018 में राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने अमेरिका को इस समझौते से बाहर खींच लिया और ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए।
ट्रंप का तर्क — और इसमें कितना दम?
ट्रंप का कहना है कि JCPOA एक खोखला समझौता था। उनके मुताबिक, इस डील में ईरान की मिसाइल प्रणाली पर कोई रोक नहीं थी। निरीक्षण व्यवस्था इतनी कमजोर थी कि ईरान आसानी से धोखा दे सकता था। सबसे बड़ी बात — डील की कई शर्तें 10 से 15 साल बाद खत्म हो जाती थीं, यानी ईरान को परमाणु बम बनाने से सिर्फ अस्थायी रूप से रोका जा रहा था।
परमाणु विशेषज्ञों के मुताबिक, जब से JCPOA टूटा, ईरान ने यूरेनियम संवर्धन की रफ्तार कई गुना बढ़ा दी। IAEA की रिपोर्टों में यह बात सामने आई कि ईरान का “ब्रेकआउट टाइम” — यानी परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी सामग्री जुटाने में लगने वाला वक्त — JCPOA के दौरान एक साल से भी ज्यादा था, लेकिन 2024 तक यह घटकर महज एक हफ्ते से भी कम रह गया।

क्या हुआ इसके बाद?
2025 में ट्रंप ने वापस सत्ता में आते ही ईरान के साथ नई बातचीत शुरू की। ओमान और रोम में कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन हालात तनावपूर्ण बने रहे। जून 2025 में इजरायल ने ईरान पर हमला किया, जिससे पूरा मामला और उलझ गया। ईरान ने अक्टूबर 2025 में आधिकारिक रूप से JCPOA को पूरी तरह खत्म घोषित कर दिया।
भारत के लिए क्यों मायने रखती है यह खबर?
भारत ईरान से कच्चा तेल खरीदता रहा है और चाबहार बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान व मध्य एशिया से जुड़ने की योजना पर काम कर रहा है। ईरान पर जब-जब अमेरिकी प्रतिबंध बढ़ते हैं, भारत की ऊर्जा नीति और व्यापार रणनीति दोनों प्रभावित होती हैं। ऐसे में यह पूरा घटनाक्रम भारत के लिए भी बेहद अहम है।
असली सवाल यह है…
क्या JCPOA वाकई एक “बुरी डील” थी, जैसा ट्रंप कहते हैं? या यह एक अधूरी लेकिन जरूरी कोशिश थी, जैसा ओबामा के समर्थक मानते हैं? इतिहास शायद इसका फैसला करेगा — लेकिन ईरान का बढ़ता परमाणु कार्यक्रम यह जरूर बताता है कि दुनिया अब पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक जगह बन गई है।
