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‘Raja Shivaji’ रिव्यू: वीरता से आगे की कहानी कहने की कोशिश, लेकिन अधूरी रह गई तलाश
रितेश देशमुख की फिल्म में दिखा शौर्य, पर शिवाजी के विचारों और मानवीय पक्ष को नहीं मिल पाया पूरा विस्तार
मराठा साम्राज्य के महान शासक Chhatrapati Shivaji Maharaj को लेकर भारतीय सिनेमा में कई बार कहानियां कही गई हैं। अक्सर इन कहानियों में उनका वीर योद्धा रूप ही प्रमुख रहा है—रणनीति, युद्ध कौशल और दुश्मनों को मात देने की कला। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक महान योद्धा होना ही उन्हें महान राजा बनाता है?
इसी सवाल को छूने की कोशिश करती है Raja Shivaji, जिसे Riteish Deshmukh ने निर्देशित और अभिनीत किया है। फिल्म शिवाजी के जीवन के कुछ अहम पलों को दिखाती है, लेकिन उनके व्यक्तित्व की गहराई तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती।
इतिहासकार Govind Pansare की चर्चित किताबों में शिवाजी को सिर्फ एक योद्धा नहीं, बल्कि एक जन-नायक के रूप में बताया गया है। उन्होंने ‘स्वराज’ का जो सपना देखा, उसमें किसानों और आम जनता—जिन्हें ‘रैयत’ कहा जाता था—की भलाई सबसे ऊपर थी। यही वजह थी कि Bajiprabhu Deshpande और Tanhaji Malusare जैसे वीर उनके लिए प्राण न्योछावर करने को तैयार रहते थे।
फिल्म में कुछ ऐसे दृश्य हैं जो शिवाजी के मानवीय पक्ष को छूने की कोशिश करते हैं। एक दृश्य में युवा शिवाजी एक वृद्ध महिला की पीड़ा सुनकर भावुक हो जाते हैं, जो पुणे में आदिलशाही और निजामशाही के अत्याचारों से त्रस्त है। इसके बाद शिवाजी का ‘स्वर्ण हल’ चलाना एक प्रतीकात्मक दृश्य है, जो जनता में उम्मीद जगाता है।
हालांकि, ये पल प्रभावशाली होते हुए भी बहुत जल्दी गुजर जाते हैं। फिल्म अधिकतर समय शिवाजी को एक ‘मिथकीय नायक’ के रूप में पेश करती है, जिससे उनके विचारों की गहराई कहीं पीछे छूट जाती है। बचपन से ही उनकी वीरता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, जिसमें उनके पिता Shahji Bhosle और भाई Sambhaji Bhosle के साथ रिश्तों को भी खास जगह दी गई है।

फिल्म का तकनीकी पक्ष जरूर मजबूत है। सिनेमैटोग्राफर Santosh Sivan ने रोशनी और छाया के खेल से दृश्यों को जीवंत बनाया है। वहीं संगीतकार जोड़ी Ajay-Atul का बैकग्राउंड स्कोर भव्यता जोड़ता है।
फिल्म में Sanjay Dutt द्वारा निभाया गया Afzal Khan का किरदार दमदार है। खासतौर पर शिवाजी और अफजल खान के बीच अंतिम मुकाबला फिल्म का सबसे रोमांचक हिस्सा बनकर उभरता है। यहां शिवाजी की रणनीति और बुद्धिमत्ता की झलक मिलती है, जब वे ‘बाघ नख’ से अफजल खान का अंत करते हैं।
लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी कमी यही है कि यह शिवाजी के बहुआयामी व्यक्तित्व को पूरी तरह सामने नहीं ला पाती। उनका प्रशासनिक कौशल, धार्मिक सहिष्णुता, और औरंगजेब को लिखे गए पत्र जैसे ऐतिहासिक पहलू फिल्म में नजर नहीं आते।
कुल मिलाकर, ‘राजा शिवाजी’ एक भव्य और भावनात्मक फिल्म जरूर है, लेकिन यह उस गहराई तक नहीं पहुंचती, जहां दर्शक यह समझ सके कि शिवाजी सिर्फ एक योद्धा नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी और जनप्रिय शासक भी थे। फिल्म खत्म होने के बाद भी यही सवाल रह जाता है—आखिर असली शिवाजी कौन थे?
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