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ईरान की मस्जिद पर चढ़ा ‘इंतकाम का लाल झंडा’ — यह झंडा जब भी उठता है, खून बहता है
खामेनेई की मौत के बाद क़ोम की जमकरान मस्जिद के गुंबद पर लाल झंडा — इतिहास बताता है कि इसके बाद क्या होता है।
दुनिया में कुछ प्रतीक ऐसे होते हैं जिन्हें देखकर ही समझ आ जाता है कि आगे क्या होने वाला है। ईरान का लाल झंडा उन्हीं प्रतीकों में से एक है।
रविवार को जब ईरानी सरकारी मीडिया ने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की पुष्टि की — तो कुछ ही घंटों में ईरान के सबसे पवित्र शहर क़ोम की मशहूर जमकरान मस्जिद के गुंबद पर एक लाल झंडा फहरा दिया गया।
इस झंडे का एक ही मतलब है — “बदला लेंगे।”
यह लाल झंडा है क्या?
शिया इस्लाम की परंपरा में लाल झंडा “इंतकाम” यानी बदले का प्रतीक है। यह तब उठाया जाता है जब कोई बड़ी शहादत होती है और उसका बदला लेने की सार्वजनिक कसम खाई जाती है।
इससे पहले यह झंडा जनवरी 2020 में उठा था — जब अमेरिकी ड्रोन हमले में IRGC के सबसे ताकतवर कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी को मारा गया था। उस वक्त ईरान ने कसम खाई थी — और कुछ ही दिनों में इराक में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर मिसाइलें दागी थीं।
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लेकिन 2020 में एक जनरल मरा था। इस बार खुद सुप्रीम लीडर मारे गए हैं। तो सोचिए — इस बार का “बदला” कितना बड़ा होगा?
जमकरान मस्जिद — ईरान की सबसे पवित्र जगहों में से एक
क़ोम शहर ईरान का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र है। यहां की जमकरान मस्जिद शिया मुसलमानों के लिए उतनी ही पवित्र है जितनी हिंदुओं के लिए काशी विश्वनाथ या मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना।
इस जगह से बदले का एलान करना सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं — यह करोड़ों शिया मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को एकजुट करने का संदेश है। यह आग सिर्फ ईरान में नहीं — इराक, लेबनान, बहरीन, पाकिस्तान और यमन तक फैल सकती है।
ट्रंप बोले — “इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक मरा”
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खामेनेई की मौत पर कोई संवेदना नहीं जताई। उन्होंने सीधे कहा — “खामेनेई — इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक — मर गया।”

और साथ ही ईरानी जनता को संदेश दिया — “यह ईरानी लोगों के लिए अपना देश वापस लेने का सबसे बड़ा मौका है।”
एक तरफ ट्रंप का यह बयान और दूसरी तरफ जमकरान मस्जिद का लाल झंडा — दोनों मिलकर बता रहे हैं कि यह जंग यहीं नहीं रुकेगी।
दुनियाभर में शोक और गुस्सा
खामेनेई की मौत की पुष्टि के बाद इराक ने तीन दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया। लेबनान, बहरीन और पाकिस्तान में सड़कों पर प्रदर्शन हुए। भारत में भी कई जगहों पर शिया समुदाय ने शोक सभाएं कीं।
लेकिन जहां शोक था, वहीं गुस्सा भी था। और वो गुस्सा अब एक लाल झंडे की शक्ल में दुनिया के सामने आ चुका है।
इतिहास गवाह है — जब भी यह झंडा उठा है, दुनिया ने उसके नतीजे देखे हैं।
