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फ्रांस ब्रिटेन और जर्मनी पर क्यों भड़का ईरान जानें क्यों वापस बुलाए राजदूत

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ईरान ने फ्रांस ब्रिटेन और जर्मनी से राजदूतों को वापस बुलाया स्नैपबैक प्रतिबंधों पर बड़ा विवाद
ईरान ने फ्रांस ब्रिटेन और जर्मनी से राजदूतों को वापस बुलाया स्नैपबैक प्रतिबंधों पर बढ़ा तनाव

ईरान और पश्चिमी देशों के रिश्तों में एक बार फिर तनाव गहरा गया है। फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी (जिन्हें सामूहिक रूप से E3 कहा जाता है) ने ईरान के खिलाफ स्नैपबैक व्यवस्था को फिर से लागू करने का ऐलान किया है। इस फैसले ने तेहरान को इतना नाराज़ कर दिया कि उसने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए तीनों देशों से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया।

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ईरानी विदेश मंत्रालय ने शनिवार को बयान जारी कर कहा कि फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने जिस तरह से उकसावे वाला निर्णय लिया है, वह अस्वीकार्य है। मंत्रालय ने पुष्टि की कि इन देशों के राजदूतों को बातचीत और परामर्श के लिए तेहरान बुला लिया गया है।

स्नैपबैक व्यवस्था क्या है?

साल 2015 में हुए परमाणु समझौते (JCPOA) के तहत यह तय किया गया था कि अगर ईरान समझौते का उल्लंघन करता है, तो 30 दिनों के भीतर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी प्रतिबंध स्वतः फिर से लागू हो जाएंगे। इसे ही स्नैपबैक व्यवस्था कहा जाता है। ई3 देशों ने अगस्त 2025 में इस सिस्टम को सक्रिय किया और सितंबर में संयुक्त राष्ट्र में इसकी आधिकारिक पुष्टि हो गई।

ईरान ने फ्रांस ब्रिटेन और जर्मनी से राजदूतों को वापस बुलाया स्नैपबैक प्रतिबंधों पर बड़ा विवाद


संयुक्त राष्ट्र की बैठक और नाकाम प्रस्ताव

19 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान के लिए प्रतिबंधों में राहत बढ़ाने वाले प्रस्ताव पर विचार किया। लेकिन यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। इसका सीधा अर्थ यह है कि परमाणु समझौते के तहत हटाए गए प्रतिबंध शनिवार रात से फिर से लागू हो जाएंगे।

2015 का परमाणु समझौता

जुलाई 2015 में ईरान और छह वैश्विक शक्तियों – ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और अमेरिका – ने JCPOA पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते का उद्देश्य था कि ईरान परमाणु हथियार न बना सके और बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटा लिए जाएं। लेकिन 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर कर दिया। इसके बाद से तेहरान ने धीरे-धीरे अपनी प्रतिबद्धताएं कम कर दीं।

रूस और चीन का विरोध

संयुक्त राष्ट्र में जब चीन और रूस ने प्रतिबंधों को बढ़ाने के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया तो अल्जीरिया, पाकिस्तान और रूस जैसे देशों ने उसका समर्थन किया। लेकिन नौ अन्य सदस्य देशों ने इसके खिलाफ मतदान किया। चूंकि किसी प्रस्ताव के पारित होने के लिए नौ सकारात्मक वोट जरूरी थे, इसलिए यह प्रस्ताव खारिज हो गया।

ईरान का सख्त रुख

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह कदम केवल नाराज़गी नहीं बल्कि पश्चिमी देशों को संदेश देने की कोशिश है। राजदूतों को वापस बुलाना हमेशा कूटनीति में एक बड़े विरोध का प्रतीक माना जाता है। यह संकेत है कि आने वाले समय में ईरान और यूरोप के रिश्ते और बिगड़ सकते हैं।

असर क्या होगा?

  • ईरान पर फिर से आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लागू होंगे।
  • तेल निर्यात पर रोक और वैश्विक लेन-देन में कठिनाइयां पैदा होंगी।
  • ईरान की घरेलू राजनीति में सरकार को कड़ा रुख अपनाने का दबाव बढ़ेगा।
  • पश्चिमी देशों और मध्य-पूर्व में पहले से तनावपूर्ण हालात और बिगड़ सकते हैं।

कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान का यह रुख केवल फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरे यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ रिश्तों पर भी पड़ेगा।

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