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दिल्ली दौरे से पहले Trump का बड़ा दांव रूसी तेल पर 500% टैरिफ मंजूर भारत से जुड़ी संस्था से भी हटे अमेरिका

अमेरिकी राजदूत के भारत आगमन से पहले Donald Trump के फैसलों ने बढ़ाया भू-राजनीतिक तनाव, रूस और भारत दोनों को मिला कड़ा संदेश

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दिल्ली दौरे से पहले Donald Trump के फैसलों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है
दिल्ली दौरे से पहले Donald Trump के फैसलों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। Donald Trump ने भारत में अमेरिकी राजदूत के प्रस्तावित आगमन से ठीक पहले ऐसे फैसले लिए हैं, जिनका असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक Trump ने रूसी तेल पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले बिल को मंजूरी दे दी है, साथ ही अमेरिका ने भारत के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय सोलर गठबंधन (ISA) से खुद को अलग करने का फैसला भी किया है।

रूसी तेल पर सख्त रुख

Trump प्रशासन का यह कदम रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद से अमेरिका लगातार रूस के ऊर्जा सेक्टर को निशाने पर लेता रहा है। अब 500% टैरिफ जैसे कड़े फैसले से यह साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका रूस से जुड़े व्यापारिक रिश्तों पर और सख्ती बरतने के मूड में है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक तेल बाजार और उन देशों पर असर पड़ सकता है, जो किसी न किसी रूप में रूसी तेल पर निर्भर हैं।

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भारत से जुड़ी संस्था से दूरी

इसी बीच अमेरिका का International Solar Alliance से हटने का फैसला भी चर्चा में है। ISA की अगुवाई India करता है और इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना है। अमेरिका के इस कदम को कुछ विश्लेषक भारत के साथ बदलते प्राथमिकताओं के संकेत के रूप में देख रहे हैं, जबकि कुछ इसे आंतरिक राजनीतिक फैसले से जोड़कर देख रहे हैं।

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दिल्ली दौरे से पहले क्यों अहम है यह फैसला

दिल्ली में अमेरिकी राजदूत के आगमन से पहले ऐसे फैसले कूटनीतिक नजरिए से बेहद अहम माने जा रहे हैं। इससे यह संकेत भी मिलता है कि अमेरिका आने वाले समय में भारत के साथ संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहता है। हालांकि दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी मजबूत बनी हुई है, लेकिन इन फैसलों ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

वैश्विक असर की आशंका

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि Trump के इन कदमों का असर सिर्फ अमेरिका–रूस या अमेरिका–भारत संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक ऊर्जा बाजार, जलवायु सहयोग और विकासशील देशों की रणनीतियों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

फिलहाल भारत सरकार और अमेरिकी प्रशासन की ओर से इस पर विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह साफ हो पाएगा कि ये फैसले सिर्फ संकेत हैं या किसी बड़े कूटनीतिक बदलाव की शुरुआत।