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घाना को मिला भारत का ‘विकास साथी पीएम मोदी की नई कूटनीतिक चाल के साथ बिहार में वोटबंदी पर घमासान
भारत-घाना रिश्तों में ऐतिहासिक साझेदारी की घोषणा, वहीं बिहार में दो करोड़ मतदाताओं को लेकर चुनाव आयोग से भिड़े विपक्षी नेता
बुधवार का दिन भारत की कूटनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था दोनों ही मोर्चों पर खास रहा। एक ओर जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घाना के राष्ट्रपति जॉन ड्रमानी महामा के साथ मिलकर भारत-घाना रिश्तों को “समग्र साझेदारी” के नए स्तर तक पहुंचा दिया, वहीं दूसरी ओर बिहार में चल रही मतदाता सूची की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया ने विपक्षी गठबंधन INDIA को चुनाव आयोग के दरवाजे पर ला खड़ा किया।
भारत और घाना की नई कूटनीतिक राह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और घाना के राष्ट्रपति के बीच हुई इस बैठक को भारत की अफ्रीकी नीति में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। चार महत्त्वपूर्ण समझौतों पर दस्तखत हुए हैं, जिनमें पारंपरिक चिकित्सा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे विषय शामिल हैं। “भारत घाना का केवल साझेदार नहीं बल्कि उसके विकास यात्रा में सहयात्री भी है,” यह बात स्वयं प्रधानमंत्री ने मीडिया बयान में कही।
अब लक्ष्य है कि अगले पांच वर्षों में भारत और घाना के बीच द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना किया जाए। इस नई पहल से अफ्रीकी महाद्वीप में भारत की स्थिति और मजबूत होने की उम्मीद है।
वोटबंदी या वोटर शोषण? बिहार में उठा सियासी तूफान
दूसरी ओर, बिहार में चल रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर विपक्षी गठबंधन INDIA ने केंद्र पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेता और संवैधानिक मामलों के जानकार अभिषेक मनु सिंघवी ने चुनाव आयोग के सामने यह दावा किया कि इस प्रक्रिया से लगभग दो करोड़ प्रवासी मतदाता मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।
राजद, जेडीयू, कांग्रेस, वाम दल समेत 11 पार्टियों के 20 नेताओं ने चुनाव आयोग से तीन घंटे लंबी बातचीत में इसे “नोटबंदी जैसी वोटबंदी” करार दिया। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता पहचान पत्र और आवश्यक दस्तावेजों की मांग इतनी जल्दी और जटिलता में की जा रही है कि आम लोग, विशेषकर प्रवासी मजदूर, वंचित रह जाएंगे।
चुनावी समर से पहले तगड़ी बिसात
प्रधानमंत्री की विदेश नीति और विपक्ष की आंतरिक लोकतांत्रिक चेतना, दोनों ही पहलुओं ने साफ कर दिया है कि देश अगले कुछ महीनों में बेहद महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह बनने वाला है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि एक विकास साझेदार की बन रही है, वहीं भीतर ही भीतर लोकतंत्र की संरचना पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव अब सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की परीक्षा बन चुके हैं।
