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भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर नई उम्मीद: भारी टैरिफ, गिरती निवेश धाराएँ और ऊर्जा साझेदारी के बीच कैसे बदल रहा है समीकरण?
अमेरिकी ट्रेड टीम दिल्ली पहुंची—50% टैरिफ के दबाव, गिरते एक्सपोर्ट, बढ़ते क्रूड इम्पोर्ट और पूंजी प्रवाह की चिंताओं के बीच भारत ने बदली अपनी रणनीति।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील पिछले कई महीनों से अनिश्चितता में फंसी हुई थी। लेकिन बुधवार से शुरू होने वाले दो-दिवसीय उच्चस्तरीय वार्ता दौर से एक बार फिर उम्मीद जगी है कि लंबे समय से अटकी यह डील अब संभवतः अपने निष्कर्ष पर पहुँच सकती है।
नई दिल्ली में उतरने वाली टीम का नेतृत्व Rick Switzer, नए Deputy USTR कर रहे हैं, जबकि भारत डील के मुख्य अमेरिकी वार्ताकार Brendan Lynch हैं। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब पिछले कुछ महीनों में भारत–अमेरिका व्यापार समीकरणों में बड़ा बदलाव आया है।
टैरिफ का दबाव: भारत का अधिशेष आधा, एक्सपोर्ट गिरा
अमेरिका के साथ व्यापार में भारत का अधिशेष कई वर्षों से विवाद का विषय रहा है।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने पहले कार्यकाल से ही इस “गुड्स ट्रेड डेफिसिट” पर चिंता जताई थी।
2025 के मौजूदा आंकड़े बताते हैं:
- भारत का वस्तु व्यापार अधिशेष $3.17 बिलियन (अप्रैल) से घटकर $1.45 बिलियन (अक्टूबर) रह गया।
- अमेरिका ने 27 अगस्त से 50% टैरिफ लगाए, जिससे भारत के श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्र—जैसे गारमेंट, फुटवियर, स्पोर्ट्स गुड्स—को बड़ा नुकसान हुआ।
- भारत का अमेरिका को एक्सपोर्ट अगस्त के $6.86 बिलियन से घटकर अक्टूबर में $6.30 बिलियन पर आ गया।
इसके उलट, भारतीय आयात तेजी से बढ़े—अगस्त के $3.6 बिलियन से अक्टूबर में $4.84 बिलियन।
रूस से कम, अमेरिका से ज्यादा—क्रूड ऑयल इम्पोर्ट में बड़ा बदलाव
दोनों देशों के बीच चल रही खींचतान के बीच एक दिलचस्प बदलाव यह है कि भारत ने अमेरिका से कच्चे तेल की खरीद को काफी बढ़ाया है।
- अप्रैल–अक्टूबर 2025 में भारत के ऑयल इम्पोर्ट में अमेरिका की हिस्सेदारी 4.43% से बढ़कर 7.48% हो गई।
- रूस, जो भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर था, उसकी हिस्सेदारी 37.88% से घटकर 32.18% पर आ गई।
इस परिवर्तन की वजह:
- अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव Lukoil और Rosneft जैसी रूसी कंपनियों पर,
- और भारत का टैरिफ प्रभाव को कम करने के लिए इम्पोर्ट स्रोतों में डाइवर्सिफिकेशन बढ़ाना।

LPG डील और परमाणु क्षेत्र पर बड़ी प्रगति
भारत की सरकारी रिफाइनरियों ने हाल ही में:
- 2.2 MTPA अमेरिकी LPG की एक साल की डील साइन की है।
- यह भारत की वार्षिक LPG जरूरत का लगभग 10% हिस्सा पूरा कर सकती है।
इसके अलावा, प्रधानमंत्री Narendra Modi ने संकेत दिए हैं कि भारत अपने न्यूक्लियर सेक्टर को निजी और विदेशी सहयोग के लिए आंशिक रूप से खोल सकता है—यह कदम अमेरिका से होने वाली बातचीत को और प्रासंगिक बनाता है।
निवेश की चिंता: टैरिफ ने पूंजी प्रवाह पर ब्रेक लगा दिया
अमेरिका के ऊंचे टैरिफ सिर्फ निर्यात के लिए चुनौती नहीं बने हैं—इसका प्रभाव भारत में निवेश (FDI, FPI) पर भी देखा जा रहा है।
Bank of America (BoFA) की रिपोर्ट के अनुसार:
- भारत में कैपिटल फ्लो—FDI, FPI और डेब्ट इनफ्लो—पिछले महीनों में तेजी से धीमे हुए हैं।
- भारतीय रिज़र्व बैंक को रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए $65 बिलियन तक डॉलर बेचने पड़े।
- रुपये की वैल्यू पिछले एक साल में लगभग 7% कमजोर हुई है।
लंबी अवधि में यह मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
भारत की नई रणनीति: सुधार, राहत और डाइवर्सिफिकेशन
ट्रेड डील में देरी और निवेश में गिरावट ने भारत सरकार को त्वरित सुधारात्मक कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है।
पिछले कुछ महीनों में:
- कई Quality Control Orders (QCO) वापस लिए गए, ताकि MSME सेक्टर को राहत मिल सके।
- कपास पर 11% ड्यूटी हटाई गई, ताकि टेक्सटाइल वैल्यू चेन को अमेरिकी टैरिफ के झटके से बचाया जा सके।
- GST दरों का रैशनलाइजेशन किया गया, कई उपयोगी उत्पादों पर टैक्स कम हुआ।
- श्रम संहिता (Labour Codes) को लागू करने की दिशा में तेज़ी दिखाई गई।
साथ ही, Rajiv Gauba (पूर्व कैबिनेट सचिव) की अगुवाई वाली समिति नए औद्योगिक सुधारों की रूपरेखा तैयार कर रही है।
भारत के नए लक्ष्य—EU, न्यूज़ीलैंड, इज़राइल, रूस… बड़े बाजारों से सीधी बातचीत
अमेरिका पर निर्भरता कम करने और निर्यात बढ़ाने के लिए भारत ने:
- यूरोपीय संघ (EU) के साथ व्यापक बातचीत शुरू की
- न्यूज़ीलैंड, इज़राइल, चिली, पेरू से भी ट्रेड वार्ता खोली
- रूस-नेतृत्व वाले Eurasian Economic Union के साथ भी डील पर शुरुआती प्रगति की
यह दिखाता है कि भारत एक मल्टी-ट्रैक ट्रेड स्ट्रेटेजी अपना रहा है, ताकि किसी एक देश की टैरिफ नीति का प्रभाव कम किया जा सके।
निष्कर्ष: डील की जमीन पहले से ज्यादा तैयार, लेकिन फैसला अब भी महत्वपूर्ण
वर्तमान परिस्थितियों में भारत और अमेरिका दोनों के लिए यह डील रणनीतिक और आर्थिक रूप से लाभकारी है—
- भारत ऊंचे टैरिफ से राहत चाहता है,
- अमेरिका चीन के मुकाबले भारत को एक स्ट्रैटेजिक पार्टनर के रूप में देखता है।
कॉमर्स सेक्रेटरी Rajesh Agrawal के शब्दों में—
“यह अब सिर्फ़ समय की बात है।”
आगे के 48 घंटे भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
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