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वीर सावरकर सम्मान पर नया बवाल! शशि थरूर ने ठुकराया अवॉर्ड, बोले—‘मेरी सहमति ली ही नहीं गई’

HRDS India ने थरूर को “वीर सावरकर इंटरनेशनल इम्पैक्ट अवॉर्ड” के लिए चुना, लेकिन कांग्रेस सांसद ने साफ कहा—उन्होंने न अवॉर्ड स्वीकार किया, न इसकी जानकारी थी।

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Shashi Tharoor Declines Veer Savarkar Award, Says He Was Not Informed
वीर सावरकर सम्मान पर बोले शशि थरूर—“मेरी मंजूरी के बिना नाम घोषित करना गलत है।”

कांग्रेस सांसद और लेखक शशि थरूर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला एक ऐसे अवॉर्ड को लेकर है, जिसे आयोजकों ने उनके नाम घोषित कर दिया, लेकिन उन्होंने खुद साफ शब्दों में इसे न स्वीकार करने का ऐलान कर दिया। बात हो रही है “वीर सावरकर इंटरनेशनल इम्पैक्ट अवॉर्ड” की, जिसे NGO HRDS India आयोजित करता है।

सोमवार शाम मीडिया रिपोर्ट्स में अचानक सामने आया कि थरूर को यह सम्मान दिल्ली में बुधवार को दिया जाएगा। लेकिन यह खबर खुद शशि थरूर के लिए भी उतनी ही चौंकाने वाली थी। उन्होंने तुरंत बयान जारी कर कहा कि न तो वह इस अवॉर्ड के बारे में जानते थे और न ही उन्होंने इसे स्वीकार किया है।


थरूर का कड़ा बयान: “मेरी सहमति के बिना नाम घोषित करना गैर-जिम्मेदाराना”

थरूर ने X (पहले ट्विटर) पर लिखा—
“मैंने यह घोषणा कल ही जान पाई, जब मैं केरल में स्थानीय निकाय चुनाव में वोट डालने गया था। मैंने न इसे स्वीकार किया है, न ही मुझे पहले से कोई सूचना दी गई।”

उन्होंने आयोजकों को गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए कहा कि उनकी सहमति के बिना नाम घोषित करना अनुचित है।

यह पहली बार नहीं है जब थरूर का नाम किसी राजनीतिक बहस के केंद्र में आया हो। इससे पहले भी संसद, विदेश नीति और ऐतिहासिक मुद्दों पर उनके बयान कई बार विवादों का कारण बने हैं।


आयोजकों का दावा: “थरूर से मुलाकात हुई थी, उन्होंने सहमति दी थी”

दूसरी ओर HRDS India के फाउंडर-सेकेटरी अजी कृष्णन ने दावा किया कि:

  • वे पहले ही थरूर से इस अवॉर्ड को लेकर मिल चुके थे,
  • थरूर को बताया गया था कि उन्हें “राष्ट्र-निर्माण में योगदान” के लिए यह सम्मान दिया जा रहा है,
  • और आयोजकों को पूरा भरोसा था कि थरूर इसे स्वीकार करेंगे।

HRDS India एक ऐसा NGO है जो देशभर में आदिवासी आवास, शिक्षा, और जीवन-यापन परियोजनाओं पर काम करने का दावा करता है। इसलिए संगठन की ओर से इस सम्मान को “राष्ट्रीय प्रभाव” का पुरस्कार बताया गया था।


‘वीर सावरकर अवॉर्ड’ और राजनीति—क्यों बढ़ा विवाद?

वीर सावरकर पर राजनीतिक मतभेद लंबे समय से चलते आए हैं।

  • भाजपा और दक्षिणपंथी संगठनों के लिए वे राष्ट्रीय विचारधारा के स्तंभ माने जाते हैं।
  • कांग्रेस और वामपंथी धारा के लिए कई बार उनके विचारों पर असहमति रही है।

ऐसे में कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद को “वीर सावरकर अवॉर्ड” दिए जाने की घोषणा ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलचल बढ़ाई।
कुछ नेताओं ने इसे “राजनीतिक चतुराई” बताया, तो कुछ ने इसे थरूर की विचारधारा से “विपरीत” कहा।

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थरूर पहले भी कई पुरस्कार ठुकरा चुके हैं

शशि थरूर उन राजनेताओं में शामिल हैं जो अपने सिद्धांतों और सार्वजनिक छवि को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं।
कुछ साल पहले उन्होंने एक साहित्यिक सम्मेलन में पुरस्कार के लिए शुल्क लेने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए थे।

उनका कहना रहा है—
“सम्मान और राजनीतिक संदेश अलग-अलग चीजें हैं। दोनों को मिलाना सही नहीं।”


क्या यह मामला और बड़ा होगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:

  • अवॉर्ड का नाम खुद में संवेदनशील है,
  • कांग्रेस इसे भाजपा की “छवि-रणनीति” बताएगी,
  • और थरूर का सार्वजनिक रूप से इसे ठुकराना चर्चा को और बढ़ाएगा।

कुछ विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि आयोजकों को अवॉर्ड घोषित करने से पहले औपचारिक स्वीकृति लेनी चाहिए थी, क्योंकि यह किसी भी मंच की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर सकता है।


निष्कर्ष

शशि थरूर और “वीर सावरकर अवॉर्ड” विवाद सीधे राजनीति, विचारधारा और संवाद की उस खाई को सामने लाता है, जो भारत की सार्वजनिक बहस में अक्सर दिखती है।

अवॉर्ड देना या न लेना व्यक्तिगत निर्णय है, लेकिन जिस तरह से यह मामला सामने आया है, उसने इसे एक साधारण सांस्कृतिक कार्यक्रम से उठाकर राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है।

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