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Politics

हमेशा सधे कपड़ों वाला गृहमंत्री 26/11 ने जिस दिन Shivraj Patil की राजनीति बदल दी

सोनिया गांधी के भरोसेमंद शिवराज पाटिल कैसे 26/11 हमलों के बाद सत्ता के सबसे कठिन फैसले का चेहरा बने

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Shivraj Patil and 26/11: How Mumbai Attacks Ended His Home Minister Tenure
26/11 हमलों के बाद केंद्रीय गृह मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले शिवराज पाटिल

26 नवंबर 2008 के 26/11 मुंबई आतंकी हमले ने सिर्फ देश की सुरक्षा व्यवस्था को ही नहीं झकझोरा, बल्कि कई बड़े राजनीतिक करियर भी उसकी चपेट में आ गए। इन्हीं में एक नाम था तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री Shivraj Patil का—एक ऐसे नेता का, जिन्हें कांग्रेस में हमेशा “सलीकेदार”, “शांत” और Sonia Gandhi का भरोसेमंद माना जाता था।

CWC की बैठक, जहां सब तय हो गया

30 नवंबर 2008 को हुई Congress Working Committee की बैठक किसी अदालत जैसी लग रही थी। चारों तरफ गुस्सा, निराशा और जवाबदेही की मांग थी। बैठक की शुरुआत में सोनिया गांधी ने साफ शब्दों में कहा—“अब सिर्फ शोक प्रस्तावों से काम नहीं चलेगा, कठिन फैसले लेने होंगे।”

उस वक्त Rahul Gandhi पाकिस्तान को लेकर सरकार की प्रतिक्रिया पर बात कर रहे थे, वहीं प्रधानमंत्री Manmohan Singh तक इस्तीफे की पेशकश कर चुके थे। रक्षा मंत्री A. K. Antony और Pranab Mukherjee भी आलोचनाओं के घेरे में थे।

लेकिन निर्णायक पल तब आया जब Dr Karan Singh ने सीधे शिवराज पाटिल की ओर देखते हुए कहा—
“शिवराज पाटिल, पार्टी को बचाने के लिए आपको जाना होगा।”

इस्तीफा जो टाला नहीं जा सका

शिवराज पाटिल ने तुरंत अपना इस्तीफा लिखा। उन्होंने दो प्रतियां बनाईं—एक प्रधानमंत्री के लिए, एक सोनिया गांधी के लिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सबके सामने इस्तीफा लेने से मना कर दिया, लेकिन पार्टी के भीतर संदेश साफ था।

इससे पहले पाटिल द्वारा समुद्री सुरक्षा के लिए नावों में ट्रांसपोंडर लगाने जैसी बातों को लेकर भी उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा था। एक मंत्री के कथित शब्द थे—“वह समुद्र में बह रहे हैं और ट्रांसपोंडर की बात कर रहे हैं।”

The Union Home Minister Shri Shivraj Patil addressing the Media on his return from the North East tour in New Delhi on February 2 2005
The Union Home Minister Shri Shivraj Patil addressing the Media on his return from the North-East tour in New Delhi on February 2, 2005.


सोनिया गांधी के करीबी कैसे बने

कांग्रेस के भीतर शिवराज पाटिल का कद अचानक नहीं बना था। 1981 में, जब Indira Gandhi के दौर में राजनीति करवट ले रही थी, तब युवा सांसद पाटिल उन नेताओं में थे जिन्होंने Rajiv Gandhi को राजनीति में लाने की पैरवी की थी।

UPA सरकार के दौरान, 2004 का लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद उन्हें गृह मंत्रालय सौंपा गया—जो सोनिया गांधी के उन पर भरोसे को दिखाता है। यहां तक कि एक समय उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए भी गंभीर दावेदार माना गया था, लेकिन अंततः Pratibha Patil का नाम सामने आया।

कपड़ों से जुड़ा विवाद और सार्वजनिक छवि

26/11 के बाद शिवराज पाटिल की छवि सिर्फ फैसलों के कारण नहीं, बल्कि उनके कपड़ों के कारण भी सवालों में आई। कभी क्रीम रंग का बंदगला, कभी काला सूट और फिर सफेद पोशाक—इस पर तीखी टिप्पणियां हुईं।

उनके करीबी कहते रहे कि यह उनकी आदत थी, दिखावा नहीं। “अगर कपड़े न बदलते, तो क्या हालात कम गंभीर हो जाते?”—उनके एक सहयोगी का यह सवाल आज भी कांग्रेस गलियारों में याद किया जाता है।

आस्था और राजनीति का संगम

शिवराज पाटिल Sathya Sai Baba के गहरे भक्त थे। वह मानते थे कि बाबा का स्मरण उन्हें संसद अध्यक्ष के रूप में संयम बनाए रखने में मदद करता था। खुद पाटिल ने एक बार कहा था कि जब लोकसभा में हंगामा होता, तो वह आंखें बंद कर बाबा को याद करते और सदन शांत हो जाता।

26/11—एक करियर का निर्णायक मोड़

शिवराज पाटिल ने 26/11 के बाद कांग्रेस नहीं छोड़ी, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे सिमटता चला गया। एक ऐसा नेता, जो कभी सत्ता के केंद्र में था, इतिहास में उस गृहमंत्री के रूप में दर्ज हो गया, जिसकी कुर्सी देश के सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद चली गई।

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