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पाकिस्तान बनेगा ईरान-अमेरिका जंग का “दूत”? इस्लामाबाद में हो सकती है ऐतिहासिक बैठक — भारत के पड़ोसी की बड़ी कूटनीतिक चाल

आर्मी चीफ Asim Munir ने ट्रंप से फोन पर बात की, PM शहबाज़ शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति से की मुलाकात — इस्लामाबाद में अमेरिकी दूत Witkoff और ईरानी विदेशमंत्री की बैठक की तैयारी; JD Vance भी हो सकते हैं शामिल।

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पाकिस्तान बनेगा ईरान-अमेरिका का मध्यस्थ? इस्लामाबाद में होगी ऐतिहासिक बैठक | Dainik Diary
पाकिस्तानी आर्मी चीफ Asim Munir ने ट्रंप को फोन किया, PM शहबाज़ ने ईरान से बात की — अब इस्लामाबाद बन सकता है अमेरिका-ईरान जंग खत्म करने की ऐतिहासिक बैठक की जगह।

इस्लामाबाद/दुबई/वाशिंगटन। दुनिया के सबसे बड़े युद्धों में से एक को रोकने की कोशिश में अब एक नया खिलाड़ी मैदान में उतर आया है — और वह है भारत का पड़ोसी पाकिस्तान

अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच चल रही जंग के चार हफ्ते बाद, जब पूरी दुनिया की नज़रें किसी मध्यस्थ की तलाश में थीं — पाकिस्तान ने चुपचाप वह काम कर दिखाया जो बड़ी-बड़ी ताकतें नहीं कर पाईं।

आर्मी चीफ का ट्रंप को फोन

पाकिस्तान के शक्तिशाली आर्मी चीफ फील्ड मार्शल Asim Munir ने रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीधी बात की — और इस्लामाबाद को अमेरिका-ईरान वार्ता की जगह के रूप में पेश किया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian से भी फोन पर बात की और भरोसा दिलाया कि पाकिस्तान शांति बहाल करने में हर संभव मदद करेगा।

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यह वही पाकिस्तान है जो कुछ महीने पहले भारत के साथ चार दिन की छोटी सी जंग लड़ रहा था — और अब उसी पाकिस्तान को दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों के बीच मध्यस्थ बनने का मौका मिल रहा है।

इस्लामाबाद क्यों?

एक वरिष्ठ पाकिस्तानी राजनयिक ने गोपनीय तरीके से बताया — “जो चीज़ पाकिस्तान को यहाँ अहम बनाती है वह है ‘पहुँच’। वाशिंगटन रावलपिंडी की सुनता है, और तेहरान इस्लामाबाद को दुश्मन नहीं मानता — यह संयोग इस संघर्ष में बेहद दुर्लभ है।”

पाकिस्तान के पास कोई अमेरिकी सैन्य अड्डा नहीं है — इसीलिए ईरान उसे “तटस्थ” मानता है। साथ ही पाकिस्तान में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी है, जो तेहरान को भरोसा देती है। दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन के साथ पाकिस्तान के रिश्ते पिछले एक साल में बेहद गर्म हुए हैं।

यह ठीक वैसा ही है जैसे 1971 में अमेरिका और चीन के बीच Henry Kissinger की गुपचुप राजनीति में पाकिस्तान ने “दूत” की भूमिका निभाई थी। उस वक्त भी इस्लामाबाद ने दो दुश्मन देशों के बीच पुल का काम किया था।

दो फॉर्मेट पर चर्चा

अमेरिकी मीडिया Axios के अनुसार इस्लामाबाद में बैठक के दो संभावित फॉर्मेट पर विचार हो रहा है — पहला, जिसमें ईरानी विदेशमंत्री Abbas Araghchi, अमेरिकी दूत Steve Witkoff और ट्रंप के दामाद Jared Kushner शामिल हों। दूसरा, जिसमें उपराष्ट्रपति JD Vance, ईरानी संसद स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf से मिलें।

अगर यह बैठक हो जाती है तो यह पाकिस्तान की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी।

पर्दे के पीछे की कहानी

पाकिस्तान के विदेशमंत्री Ishaq Dar ने पिछले हफ्ते रियाद में तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब के विदेशमंत्रियों से मिलकर यह जमीन तैयार की थी। पाकिस्तानी अधिकारी पिछले दो दिनों से अमेरिकी दूत Witkoff और ईरानी विदेशमंत्री Araghchi के बीच संदेश पहुँचाने का काम कर रहे हैं।

यानी जब दोनों देश सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे को धमकियाँ दे रहे थे, पर्दे के पीछे इस्लामाबाद उनके बीच “फोन ऑपरेटर” का काम कर रहा था।

पाकिस्तान बनेगा ईरान-अमेरिका का मध्यस्थ? इस्लामाबाद में होगी ऐतिहासिक बैठक | Dainik Diary


पाकिस्तान को क्या मिलेगा?

यह सवाल भारत में भी उठ रहा है।

पाकिस्तान होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में है — वह अपनी लगभग सारी कच्चे तेल की ज़रूरत खाड़ी देशों से पूरा करता है और लगभग सारी LNG भी वहीं से लाता है। यानी यह मध्यस्थता सिर्फ “नेकनीयती” नहीं — अपनी अर्थव्यवस्था बचाने की भी कोशिश है।

साथ ही अगर पाकिस्तान इस जंग को रुकवाने में कामयाब हो गया, तो उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर वह इज्ज़त मिलेगी जिसकी उसे बहुत ज़रूरत है। IMF का कर्ज़ चुकाना हो या अमेरिकी मदद पानी हो — एक “शांति-दूत” की छवि बहुत काम आती है।

क्या बात होगी?

PM शहबाज़ शरीफ ने X पर लिखा — “पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच एक व्यापक और समग्र समझौते के लिए सार्थक वार्ता की मेजबानी करने को तैयार और सम्मानित महसूस करता है।”

लेकिन अभी तक न अमेरिका और न ईरान ने इस ऑफर पर आधिकारिक मुहर लगाई है।

आगे क्या?

दुनिया की निगाहें इस हफ्ते इस्लामाबाद पर टिकी हैं। अगर यह बैठक होती है तो यह न सिर्फ ईरान-अमेरिका युद्ध का अंत हो सकता है — बल्कि पाकिस्तान के लिए एक नए युग की शुरुआत भी। और भारत के लिए — एक नई चुनौती।

— दैनिक डायरी न्यूज़ डेस्क