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कांटों भरा ताज और जनता की उम्मीदें… आज Adda में जम्मू-कश्मीर के CM उमर अब्दुल्ला ने खोले सत्ता के सच
सीमित अधिकार, LG का दबदबा और राज्यhood की उम्मीदों के बीच कैसे संतुलन बना रहे हैं CM उमर अब्दुल्ला
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में सत्ता हमेशा आसान नहीं रही, लेकिन उमर अब्दुल्ला के लिए यह जिम्मेदारी किसी कांटों भरे ताज से कम नहीं है। करीब एक साल पहले जब उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, तब उन्हें पहले से पता था कि यह पद सिर्फ कुर्सी नहीं, बल्कि संघर्ष, सीमाएं और उम्मीदों का बोझ भी लेकर आता है।
आज Adda कार्यक्रम में बतौर मेहमान पहुंचे उमर अब्दुल्ला ने उसी जमीनी सच्चाई की झलक दिखाई, जिससे उनकी सरकार रोज जूझ रही है।
(Omar Abdullah )
(Jammu and Kashmir)
सीमित प्रशासनिक अधिकार, लेकिन असीम उम्मीदें
जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) है, जहां पुलिस और कई अहम प्रशासनिक शक्तियां सीधे राजभवन (LG Office) के अधीन हैं। IAS अधिकारियों के तबादले से लेकर कई बड़े फैसलों पर चुनावी सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं है।
ऐसे में मुख्यमंत्री के सामने दोहरी चुनौती है—
- एक तरफ प्रशासनिक सीमाएं,
- दूसरी तरफ जनता की बड़ी उम्मीदें।
Adda में बातचीत के दौरान यह साफ झलका कि उमर अब्दुल्ला खुद इस असंतुलन को महसूस करते हैं, लेकिन फिर भी वे इसे हार नहीं, बल्कि संघर्ष की शुरुआत मानते हैं।

राज्यhood की उम्मीद अब भी जिंदा
उमर अब्दुल्ला की सरकार को सबसे ज्यादा ताकत मिलती है उस उम्मीद से कि जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा मिलेगा। यही उम्मीद उनके लिए राजनीतिक संबल भी है और जनता से जुड़ने का सबसे बड़ा माध्यम भी।
उन्होंने संकेतों में यह भी साफ किया कि जब तक पूर्ण राज्यhood नहीं मिलती, तब तक विकास, रोजगार और भरोसे की राजनीति ही उनका फोकस रहेगा।
एक साल का अनुभव: सत्ता से ज्यादा जिम्मेदारी
मुख्यमंत्री बनने के बाद के एक साल को अगर देखा जाए, तो उमर अब्दुल्ला ने खुद को सिर्फ एक शासक नहीं, बल्कि मध्यस्थ और प्रतिनिधि के रूप में पेश किया है—जो दिल्ली और कश्मीर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है:
- युवाओं में भरोसा बनाए रखना
- विकास योजनाओं को जमीन पर उतारना
- और राजनीतिक संवाद को जिंदा रखना
जनता की नजरें और सियासी दबाव
जम्मू-कश्मीर की जनता सिर्फ वादे नहीं, परिणाम चाहती है। यही वजह है कि उमर अब्दुल्ला पर दबाव सामान्य मुख्यमंत्रियों से कहीं ज्यादा है। Adda में उनकी मौजूदगी इसी सियासी दबाव और आत्ममंथन की तस्वीर पेश करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा ढांचे में काम करना भले ही मुश्किल हो, लेकिन अगर उमर अब्दुल्ला जनता से संवाद बनाए रखते हैं, तो यह उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
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