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निर्थारी कांड में बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली को किया बरी, अब जेल से होगी रिहाई
18 साल पुराने निर्थारी हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली की सजा रद्द की, कहा – सबूतों में गंभीर खामियां
नोएडा के चर्चित निर्थारी कांड में मंगलवार को एक बड़ा मोड़ आया है। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जांच और सुनवाई के दौरान कई प्रक्रियात्मक और साक्ष्यगत खामियां रहीं, जिसके चलते सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति सूर्या कांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की तीन जजों की पीठ ने कोली की क्यूरेटिव याचिका को मंजूरी देते हुए कहा कि यदि किसी अन्य मामले में उसकी गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
निर्थारी कांड का दर्दनाक सच
29 दिसंबर 2006 को नोएडा के सेक्टर-31 में मोनिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे नाले से बच्चों के कंकाल मिलने के बाद देश भर में सनसनी फैल गई थी। जांच के दौरान सामने आया कि कई बच्चों और महिलाओं की हत्या कर शवों को वहीं फेंक दिया गया था। यह मामला ‘निर्थारी कांड’ के नाम से कुख्यात हुआ।
पुलिस जांच में सुरेंद्र कोली, जो पंढेर का नौकर था, पर आरोप लगा कि उसने बच्चों के साथ दुष्कर्म और हत्या की। उस समय यह मामला देश के सबसे भयावह अपराधों में से एक माना गया था।

कोर्ट ने क्यों दी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साक्ष्यों की श्रृंखला में कमी और फोरेंसिक रिपोर्ट्स में विरोधाभास के कारण सजा को सही नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि निचली अदालत और हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया था।
कोर्ट के इस फैसले से कोली के खिलाफ चल रहे सभी मामलों में यह आखिरी था। बाकी मामलों में पहले ही उसे राहत मिल चुकी है। इस तरह अब लगभग 18 साल बाद वह जेल से बाहर आने की स्थिति में है।
निर्थारी केस का समाज पर प्रभाव
निर्थारी कांड ने देश के बच्चों की सुरक्षा और सामाजिक ढांचे पर गहरा सवाल खड़ा किया था। यह मामला आज भी भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली और जांच एजेंसियों की भूमिका पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए एक कठोर सबक है कि बिना पुख्ता सबूत किसी को दोषी ठहराना समाज और न्याय, दोनों के लिए खतरनाक है।
भविष्य में क्या होगा
अब कोली की रिहाई के बाद सवाल यह भी उठ रहा है कि मोनिंदर सिंह पंढेर के खिलाफ बाकी मामलों में क्या रुख अपनाया जाएगा। हालांकि, कानून विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और पुनर्विचार की शक्ति को मजबूत करता है।
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