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तुर्की पर ईरानी मिसाइल NATO ने हवा में तोड़ा, लेकिन सवाल उठा: क्या ईरान ने बहुत बड़ी गलती कर दी?
अमेरिका-इज़राइल और ईरान की जंग के 5वें दिन ईरान ने NATO सदस्य तुर्की की तरफ बैलिस्टिक मिसाइल दागी — NATO के एयर डिफेंस ने उसे बीच रास्ते में नष्ट किया, पर दुनिया की सांसें थम गईं।
नई दिल्ली/अंकारा। कहते हैं शतरंज में एक गलत चाल पूरी बाज़ी पलट देती है। ईरान ने शायद ऐसी ही एक चाल चली है — और अब दुनिया यह देख रही है कि इसका अंजाम क्या होगा।
अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के पांचवें दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे NATO गठबंधन को हिलाकर रख दिया। ईरान ने एक बैलिस्टिक मिसाइल तुर्की की दिशा में दागी — वही तुर्की, जो NATO का सदस्य है। मिसाइल इराक और सीरिया के रास्ते तुर्की के हवाई क्षेत्र में घुसने की कोशिश कर रही थी, लेकिन NATO के एयर डिफेंस सिस्टम ने उसे बीच रास्ते में ही नष्ट कर दिया। तुर्की के अधिकारियों ने पुष्टि की कि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ।
जंग कहाँ से शुरू हुई?
यह संघर्ष उस शनिवार से शुरू हुआ जब अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए। इसके बाद ईरान ने पूरे मध्य-पूर्व में मिसाइलें और ड्रोन बरसाने शुरू कर दिए। इज़राइल, इराक, जॉर्डन और खाड़ी के सभी छह देश — सऊदी अरब, UAE, कुवैत, बहरीन, कतर और ओमान — इन हमलों की चपेट में आए। ईरान का मकसद था इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना।
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लेकिन एक देश को ईरान ने शुरुआत में छोड़ दिया था — तुर्की।
तुर्की को क्यों बख्शा था ईरान ने?
तुर्की एक बहुसंख्यक सुन्नी मुस्लिम देश है और ईरान से उसकी 500 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते रहे हैं। इसके अलावा तुर्की NATO का सदस्य जरूर है, लेकिन वह अमेरिका और इज़राइल से हमेशा एक दूरी बनाकर चलता रहा है। राष्ट्रपति एर्दोगान ने गाज़ा मुद्दे पर इज़राइल की कड़ी आलोचना भी की है। शायद इसीलिए ईरान ने शुरुआत में तुर्की को अपने निशाने से बाहर रखा।
लेकिन बुधवार को यह सब बदल गया।
NATO पर हमला — यानी सबसे बड़ा दांव
जब ईरान की मिसाइल तुर्की की तरफ बढ़ी, तो यह सिर्फ एक देश पर हमला नहीं था। NATO की संधि का अनुच्छेद 5 कहता है — एक पर हमला, सब पर हमला। यानी अगर तुर्की पर मिसाइल गिरती, तो तकनीकी रूप से अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी समेत 30 से ज़्यादा देश ईरान के खिलाफ युद्ध में उतर सकते थे।
यह वैसा ही होता जैसे कोई गली का लड़ाकू पूरे मोहल्ले को एक साथ ललकार ले।
NATO के एयर डिफेंस ने मिसाइल को नष्ट करके फिलहाल इस खतरे को टाल दिया, लेकिन सवाल यह है — क्या यह ईरान की जानबूझकर की गई चेतावनी थी, या एक बड़ी रणनीतिक भूल?

विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस वक्त हर मोर्चे पर एक साथ लड़ने की कोशिश कर रहा है — जो किसी भी सेना के लिए आत्मघाती हो सकता है। जब खामेनेई जैसा सर्वोच्च नेता मारा जाए, तो देश में एक तरह की भावनात्मक और सामरिक अफरातफरी आ जाती है। ऐसे में जो निर्णय लिए जाते हैं, वे अक्सर भावना में लिए जाते हैं, रणनीति में नहीं।
भारत के नजरिए से देखें तो इस युद्ध का असर तेल की कीमतों पर सीधा पड़ सकता है। खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भी एक बड़ा सवाल बन गई है।
आगे क्या होगा?
अगर ईरान ने तुर्की को दोबारा निशाना बनाया और कोई नुकसान हुआ, तो NATO की प्रतिक्रिया बेहद तीखी हो सकती है। यह जंग तब सिर्फ अमेरिका-इज़राइल बनाम ईरान नहीं रहेगी — यह पूरे पश्चिमी गठबंधन बनाम ईरान बन जाएगी।
और उस स्थिति में, ईरान अकेला होगा।
Dainik Diary की नज़र से
यह युद्ध अब सिर्फ मध्य-पूर्व की समस्या नहीं रही। जब मिसाइलें NATO की सीमाओं को छूने लगें, तो यह पूरी दुनिया की समस्या बन जाती है। भारत को भी इस स्थिति पर कड़ी नज़र रखनी होगी — क्योंकि इस आग की लपटें दूर तक जा सकती हैं।
