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छत्तीसगढ़ कोयला ब्लॉक आवंटन केस में HC गुप्ता बरी – अदालत ने कहा सबूतों में ‘भ्रष्ट इरादे’ का कोई निशान नहीं

दिल्ली की विशेष अदालत ने पूर्व कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता और संयुक्त सचिव के.एस. क्रोफा को किया बरी, कहा – उन्होंने जनहित के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

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छत्तीसगढ़ कोयला ब्लॉक केस में HC गुप्ता को राहत, अदालत ने कहा भ्रष्ट इरादे के सबूत नहीं
दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट का फैसला – एच.सी. गुप्ता और के.एस. क्रोफा को मिली बड़ी राहत, अदालत ने कहा “कोई भ्रष्ट इरादा साबित नहीं।”

कभी देश के सबसे चर्चित घोटालों में गिने जाने वाले कोयला ब्लॉक आवंटन मामले (Coal Scam) में अब न्यायालय के फैसले एक नई तस्वीर पेश कर रहे हैं। शुक्रवार को दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व कोयला सचिव एच.सी. गुप्ता, संयुक्त सचिव के.एस. क्रोफा और आर.के.एम. पावरजेन प्राइवेट लिमिटेड के निदेशकों को बरी करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो दर्शाए कि इन अधिकारियों ने जनहित के खिलाफ कोई निर्णय लिया हो।

अदालत का स्पष्ट संदेश

विशेष न्यायाधीश धीरेज मोर ने अपने आदेश में लिखा – “रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जो यह साबित करे कि अभियुक्त अधिकारियों का कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा था।”
उन्होंने आगे कहा, “अगर किसी प्रक्रिया में कुछ अनियमितताएँ हैं, परंतु दुर्भावना या ‘मेंस रिया’ (criminal intent) नहीं पाई जाती, तो उसे आपराधिकता का स्वरूप नहीं दिया जा सकता।”

यह फैसला 31 अक्टूबर को दिया गया था और इसे कोयला घोटाले से जुड़े उन मामलों में चौथा करार दिया गया है, जहाँ सरकारी अधिकारियों को अदालत से राहत मिली है।

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मामला क्या था?

यह मामला छत्तीसगढ़ के फतेहपुर ईस्ट कोयला ब्लॉक के आवंटन से जुड़ा था, जिसे 2006 में आर.के.एम. पावरजेन प्रा. लि. को 1,200 मेगावाट की थर्मल पावर परियोजना के लिए दिया गया था।
2014 में सीबीआई ने आरोप लगाया कि कंपनी ने अपनी नेटवर्थ को गलत तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया ताकि उसे आवंटन में फायदा मिल सके।

सीबीआई के अनुसार, कंपनी की नेटवर्थ केवल 21.51 करोड़ थी जबकि मानक के अनुसार कम-से-कम ₹500 करोड़ होना चाहिए था। हालांकि, अदालत में यह साबित हुआ कि कंपनी ने किसी भी दस्तावेज में गलत जानकारी नहीं दी और उसका आवेदन सभी निर्धारित मानकों पर शीर्ष स्थान पर था।

अदालत ने क्या पाया

न्यायाधीश ने कहा कि “मंत्रालय द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार कंपनी पात्र थी और उसके आवेदन में कोई झूठी सूचना नहीं थी।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि “अभियुक्त अधिकारियों को किसी गलत जानकारी की जानकारी नहीं थी, और न ही उन्होंने किसी कंपनी को अनुचित लाभ देने का प्रयास किया।”

इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा कि समिति के निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए थे, इसलिए केवल दो अधिकारियों को दोषी ठहराना “असंगत” है।

लगातार राहत के फैसले

पिछले एक साल में यह चौथा अवसर है जब इसी मामले से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों को अदालत से राहत मिली है।

  • दिसंबर 2024 और जून 2025 में दो मामलों में बरी किया गया।
  • अप्रैल 2025 में तीसरे मामले में आरोपमुक्त किया गया।

जनता के विश्वास का मामला

यह फैसला सिर्फ एक कानूनी राहत नहीं बल्कि नौकरशाही तंत्र में विश्वास बहाल करने वाला निर्णय भी माना जा रहा है।
एच.सी. गुप्ता जैसे अधिकारी, जिन्होंने अपने करियर में ईमानदारी और सादगी की मिसाल पेश की थी, वर्षों तक इस केस में अदालत के चक्कर लगाते रहे। आज उनके लिए यह फैसला एक “मान-सम्मान की पुनः प्राप्ति” जैसा है।

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विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला यह संदेश देता है कि प्रशासनिक निर्णयों में की गई त्रुटियाँ और भ्रष्ट इरादों वाले अपराधों के बीच फर्क समझना जरूरी है। जब तक किसी अधिकारी के खिलाफ स्पष्ट साक्ष्य न हों कि उसने जनहित से हटकर निजी लाभ के लिए कार्य किया, तब तक उसे अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में अदालत का यह फैसला न सिर्फ आरोपियों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह देश की न्याय व्यवस्था के लिए भी एक संतुलित दृष्टिकोण का उदाहरण है। यह बताता है कि हर अनियमितता भ्रष्टाचार नहीं होती — और जब तक दुर्भावनापूर्ण इरादा सिद्ध न हो, तब तक न्याय व्यवस्था का दायित्व है कि निर्दोषों को सम्मानपूर्वक मुक्त किया जाए।

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