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Politics

राज्यसभा में अमित शाह का बड़ा बयान: “वंदे मातरम् दो हिस्सों में नहीं बंटता तो भारत का बंटवारा भी नहीं होता”

गृह मंत्री अमित शाह ने वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि को इस्लामी आक्रमणों, ब्रिटिश सांस्कृतिक थोपन और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा—सदन में गूंजा इतिहास, राजनीति और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का संगम।

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Amit Shah on Vande Mataram: “If it wasn’t divided, Partition wouldn’t have happened” | Rajya Sabha Debate | Dainik Diary
राज्यसभा में वंदे मातरम् पर बोलते हुए अमित शाह—सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, इतिहास और विभाजन पर तीखी राजनीतिक बहस छिड़ी।

राज्यसभा के शीतकालीन सत्र में मंगलवार का दिन पूरी तरह वंदे मातरम् और उसकी ऐतिहासिक विरासत के नाम रहा।
देश के गृह मंत्री अमित शाह ने एक गहन और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भाषण में कहा कि इस गीत की पृष्ठभूमि को सिर्फ़ साहित्य या भावना के स्तर पर नहीं, बल्कि भारत के सांस्कृतिक संघर्षों से जोड़कर समझना होगा।

“वंदे मातरम् की रचना सदियों के घावों और संघर्षों से निकली थी” — अमित शाह

शाह ने अपने भाषण में कहा कि वंदे मातरम् की रचना की पृष्ठभूमि में दो बड़े ऐतिहासिक दौर छिपे हैं—

  1. इस्लामी आक्रमणों का लम्बा काल, जिसने भारतीय सभ्यता, परंपराओं और संस्थाओं को झकझोरा।
  2. ब्रिटिश साम्राज्य का सांस्कृतिक थोपन, जिसने भारतीय समाज को अपनी सभ्यता के अनुरूप ढालने का प्रयास किया।

इन दोनों परिस्थितियों में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ऐसे समय में वंदे मातरम् की रचना की, जब भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था। शाह के अनुसार, इस गीत में भारत की “मूल सभ्यता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” गहराई से समाहित है।


शाह के बयान का राजनीतिक संदर्भ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में ब्रिटिश प्रशासक थॉमस बैबिंगटन मैकाले की विरासत पर टिप्पणी कर चुके हैं—
कि औपनिवेशिक शासन का उद्देश्य ऐसे भारतीय तैयार करना था जो दिखने में भारतीय हों, पर सोच और चरित्र में ब्रिटिश।

इसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए शाह ने कहा कि वंदे मातरम् वह सांस्कृतिक प्रतिरोध था, जो बिना किसी आधिकारिक माध्यम के भी जनता की आत्मा से जुड़ गया।


“न ब्रिटिश रोक पाए, न उनके अनुयायी”—वंदे मातरम् की पहुँच

शाह ने कहा कि औपनिवेशिक सत्ता ने वंदे मातरम् को प्रतिबंधित किया, पर यह गीत स्वतः ही पूरे भारत में स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया।
उनके शब्दों में—

“बंकिम बाबू ने राष्ट्र को मां के रूप में कल्पित किया… और यह रचना लोगों के दिलों में छिपे राष्ट्रभाव को जगाने का काम करती रही।”

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नेहरू को लेकर सबसे तीखी टिप्पणी

शाह ने अपने भाषण के अंत में वह पंक्तियाँ कहीं जिसने सदन में तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी—

“जब वंदे मातरम् 50 वर्ष पूरे कर रहा था, देश स्वतंत्र नहीं हुआ था। और जब यह 50 वर्ष का हुआ, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे दो हिस्सों में बांट दिया। यदि वंदे मातरम् विभाजित न होता, तो देश का विभाजन भी नहीं होता।”

यह बयान न सिर्फ़ कांग्रेस की भूमिका पर सवाल था, बल्कि यह स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों को नए राजनीतिक संदर्भों में पुनः प्रस्तुत करने का प्रयास भी माना जा रहा है।


विपक्ष की प्रतिक्रिया—“इतिहास का राजनीतिक उपयोग”

कांग्रेस और विपक्षी दलों ने शाह के बयान को “ऐतिहासिक तथ्यों का सरलीकरण” और “राजनीतिक ध्रुवीकरण” बताया।
उनका कहना है कि देश का विभाजन कई सामाजिक–राजनीतिक कारणों का परिणाम था, जिसे किसी एक घटना या निर्णय से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।


वंदे मातरम्—साहित्य, राजनीति और राष्ट्रवाद का तिकोना

वंदे मातरम् भारतीय इतिहास का वह गीत है जिसने:

  • स्वतंत्रता सेनानियों का जोश बढ़ाया,
  • ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी,
  • और आज भी राष्ट्रीय पहचान की बहस में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

लेकिन इसके राजनीतिक और सांस्कृतिक अर्थ आज भी बदलते समय के साथ नए आयाम प्राप्त करते रहते हैं।


निष्कर्ष

राज्यसभा में अमित शाह का यह बयान सिर्फ़ इतिहास का उल्लेख नहीं था—यह वर्तमान और भविष्य की राजनीति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा और राष्ट्रीय प्रतीकों की व्याख्या को लेकर व्यापक बहस की शुरुआत है।

वंदे मातरम् पर चर्चा केवल शब्दों की चर्चा नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्र–निर्माण की यात्रा, उसकी स्मृतियों और उसके भविष्य की दिशा को लेकर विमर्श भी है।

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