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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला क्यों बदलेगा राज्यों में सत्ता का समीकरण? जानिए 14 अहम सवालों पर SC ने क्या कहा
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक राय—अब राज्यपाल न कर पाएंगे बिल पेंडिंग, न ही असहमति को लंबा खींच पाएंगे।
नई दिल्ली — देश की राजनीति में एक लंबे समय से चल रही बहस पर आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाकर विराम लगा दिया। यह फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए उन 14 महत्वपूर्ण प्रश्नों पर आया है, जिनका सीधा संबंध राज्यपालों के अधिकार, जिम्मेदारियों और राज्य सरकारों के साथ उनके संबंधों से है।
यह फैसला उस समय और भी अहम माना जा रहा है जब देश के कई राज्यों—तमिलनाडु, पंजाब, केरल, तेलंगाना—में सरकारें और राज्यपाल आमने-सामने दिखे। कहीं बिलों पर हस्ताक्षर लंबित थे, तो कहीं सरकारें आरोप लगा रही थीं कि राज्यपाल संवैधानिक दायरे से बाहर जा रहे हैं।
राज्यों की दिक्कतें, केंद्र की चिंताएं, और अब SC का जवाब
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्यपाल के पास “withhold assent simpliciter” यानी बिल को अनिश्चितकाल तक रोके रखने का कोई अधिकार नहीं है।
इसका मतलब यह हुआ कि अब राज्यपाल किसी भी बिल को अपनी टेबल पर महीनों नहीं रोक सकते।
फैसले में कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं, जिनमें से कुछ सीधे राज्यों की शासन-व्यवस्था पर असर डालेंगे। उदाहरण के तौर पर, पंजाब में कई महीनों से पड़ी फाइलें और तमिलनाडु में पेंडिंग बिल अब तेजी से आगे बढ़ेंगे, क्योंकि SC ने साफ कर दिया है—राज्यपाल का काम अनुमोदन में देरी करना नहीं, बल्कि संवैधानिक रूप से आगे बढ़ना है।

SC के फैसले की 3 मुख्य बातें
- राज्यपाल बिल पेंडिंग नहीं रख सकते।
देरी संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन मानी जाएगी। - बिल को राष्ट्रपति के पास भेजना एक विकल्प है, बहाना नहीं।
यह तभी होगा जब बिल संविधान के खिलाफ हो या राष्ट्रीय महत्व से जुड़ा हो। - कैबिनेट की सलाह सर्वोपरि।
राज्यपाल ‘सुपर चीफ़ मिनिस्टर’ की तरह काम नहीं कर सकते।
कई राज्यों में राजनीति का मौसम बदलेगा
इस फैसले का व्यापक असर उन राज्यों पर पड़ेगा जहां हाल के महीनों में सरकार और राज्यपाल के बीच लगातार तनाव देखा गया—जैसे तमिलनाडु और पंजाब। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में विधानसभा में पास बिलों के अटकने वाले मामलों में कमी आएगी।
कानूनी विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला इसी तरह महत्वपूर्ण है जैसे ‘एस.आर. बोम्मई केस’ ने राज्यों में राष्ट्रपति शासन के दुरुपयोग को रोकने का काम किया था। यह फैसला भी राज्यपाल पद को राजनीतिक टकराव का मैदान बनने से रोकने की कोशिश है।
जनता के लिए क्यों मायने रखता है?
बिलों पर देरी का सीधा असर लोगों की ज़रूरतों और योजनाओं पर पड़ता है—जैसे स्वास्थ्य से जुड़े बिल, शिक्षा सुधार, किसानों से जुड़े कानून, और बिजली सुधार। अब ऐसी योजनाएँ महीनों तक राज्यपाल की टेबल पर नहीं अटकेंगी।
तमिलनाडु में छात्रों के एडमिशन से जुड़े बिल हों या पंजाब में डरग रैकेट पर नियंत्रण के लिए मंजूरी का इंतज़ार कर रहे कानून—यह फैसला उन सभी मामलों पर तेज़ी लाएगा।
मानव स्पर्श—एक फैसला जो जनता की धड़कन से जुड़ा
जब फैसले का विवरण पढ़ा जा रहा था, कोर्टरूम में मौजूद कई संविधान विशेषज्ञों ने सिर हिलाकर इसे “लॉन्ग ओवरड्यू” बताया। कोई-कोई यह भी कहते सुना गया कि यह फैसला लोकतंत्र की उस धारा को मजबूत करेगा जिसमें जनता द्वारा चुनी गई सरकार को वह अधिकार मिलता है जो उसे मिलना चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों में कई खबरें आईं कि राज्यपाल महीनों तक बिलों को रोके बैठे हैं, जिससे छात्रों, किसानों और आम नागरिकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस फैसले ने उन सभी आवाज़ों को न्याय जैसा दिया है।
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