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20 हज़ार डॉलर के ड्रोन बनाम 4 मिलियन डॉलर की मिसाइल: क्या अमेरिका–ईरान टकराव में ‘गणित’ बदल रहा है?

20 हज़ार डॉलर के ड्रोन बनाम 4 मिलियन डॉलर की मिसाइल: क्या अमेरिका–ईरान टकराव में ‘गणित’ बदल रहा है?

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20 हज़ार डॉलर के ड्रोन बनाम 4 मिलियन डॉलर की मिसाइल: क्या अमेरिका–ईरान टकराव में ‘गणित’ बदल रहा है?
महंगी मिसाइलों के सामने ईरान के सस्ते ड्रोन—आज की जंग में बदलता रणनीतिक संतुलन।

मध्य-पूर्व में जारी तनाव अब सिर्फ आग और बारूद का खेल नहीं रह गया है—यह एक गणित की जंग भी बन चुका है। एक तरफ ईरान के सस्ते, एक-तरफा हमला करने वाले शहीद ड्रोन हैं, और दूसरी तरफ अमेरिका व उसके साझेदारों की अत्याधुनिक एयर-डिफेंस मिसाइलें, जिनकी कीमत सुनकर किसी भी सैन्य योजनाकार की भौंहें उठ सकती हैं।

ईरान के शहीद ड्रोन, जिनकी कीमत लगभग 20,000 डॉलर बताई जाती है, को रोकने में अमेरिकी Patriot इंटरसेप्टर मिसाइलें काम में लाई जा रही हैं—जिनकी एक मिसाइल की लागत करीब 4 मिलियन डॉलर है। यह असमानता न केवल आर्थिक दबाव बढ़ा रही है, बल्कि रणनीतिक चिंताएँ भी गहरा रही हैं।

ड्रोन सस्ते, मिसाइलें महंगी—युद्ध का बदलता समीकरण

United States-समर्थित एयर-डिफेंस सिस्टम ईरान के हमलों को रोकने में 90% से अधिक प्रभावी साबित हुए हैं। लेकिन यह सफलता महँगी पड़ रही है। एक-एक हमले में लाखों डॉलर की इंटरसेप्टर मिसाइलें खर्च हो रही हैं, जबकि ईरान बहुत कम लागत में बड़ी संख्या में ड्रोन तैयार कर लेता है।

रिपोर्टों के मुताबिक, Iran हजारों की संख्या में शहीद-श्रेणी के ड्रोन रखता है, जिन्हें बनाना भी आसान है और छापामार रणनीति में यह बेहद कारगर साबित हो रहे हैं।

ईरान की रणनीति: ‘थकाओ और दबाव बनाओ’

Stimson Center की विशेषज्ञ Kelly Grieco के अनुसार, “यह ईरान की सोची-समझी क्षरण (attrition) रणनीति है। लक्ष्य यह है कि रक्षात्मक देश अपने महंगे इंटरसेप्टर तेजी से खर्च करें, जिससे उनका राजनीतिक और सैन्य धैर्य टूटने लगे।”

20 हज़ार डॉलर के ड्रोन बनाम 4 मिलियन डॉलर की मिसाइल: क्या अमेरिका–ईरान टकराव में ‘गणित’ बदल रहा है?


अंदरूनी मूल्यांकन में यह भी दावा हुआ कि Qatar के पास मौजूदा उपयोग दर के हिसाब से सिर्फ चार दिन के Patriot इंटरसेप्टर शेष रह सकते हैं। हालांकि, कतरी अधिकारियों ने इस अनुमान को खारिज किया है।

अमेरिकी शस्त्र भंडार पर बढ़ता दबाव

अमेरिका की ओर से सवाल उठ रहे हैं कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है, तो क्या पर्याप्त मिसाइलें उपलब्ध होंगी।

अमेरिका के रक्षा सचिव Pete Hegseth ने कहा, “यह न कभी इराक जैसा था, न होगा। यह अंतहीन युद्ध नहीं है।”

बीते वर्ष Lockheed Martin ने लगभग 600 PAC-3 मिसाइलें बनाई थीं, जबकि क्षेत्र में पहले ही हजारों मिसाइलें दागी जा चुकी होंगी।

सऊदी अरब और United Arab Emirates जैसे देश THAAD जैसी और भी महँगी मिसाइलें चला रहे हैं, जिनकी एक यूनिट की कीमत लगभग 12 मिलियन डॉलर तक पहुँचती है।

ईरान की कमजोरी भी उजागर

जहाँ ईरान ड्रोन हमले जारी रख रहा है, वहीं उसकी अपनी वायु-रक्षा प्रणाली काफी कमजोर पड़ चुकी है। कई शुरुआती हमलों में ईरान के S-300 जैसे सिस्टम निशाने पर आ गए।

इसके अलावा, ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने स्वीकार किया कि सैन्य इकाइयाँ कई बार राजनीतिक नेतृत्व से अलग-थलग होकर काम कर रही हैं।

पिछले सप्ताह की बड़ी घटना में, ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की हवाई हमले में मौत ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ा दी है। उनकी चेतावनी थी कि यदि अमेरिका द्वारा हमला हुआ, तो क्षेत्र-व्यापी संघर्ष शुरू हो जाएगा—और अब वही स्थिति बनती दिख रही है।

भविष्य का सवाल: क्या यह युद्ध ‘खर्च’ तय करेगा?

युद्ध के इतिहास में अक्सर तकनीक ने जीत तय की है। लेकिन इस नई लड़ाई में गणित—यानि लागत—टेक्नोलॉजी से आगे निकलता दिख रहा है।

सवाल अब यह है कि क्या अमेरिका और उसके सहयोगी महँगी मिसाइलों पर निर्भर रहकर लड़ाई जारी रख पाएँगे, या ईरान की कम-लागत, बड़ी संख्या वाली ड्रोन रणनीति उन्हें नई दिशा अपनाने पर मजबूर करेगी?