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850 टॉमहॉक मिसाइलें दाग दीं अब पेंटागन के हाथ-पाँव फूले, स्टॉक हो रहा खाली!
अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सिर्फ चार हफ्तों में 850 से ज्यादा टॉमहॉक मिसाइलें दाग दीं — लेकिन अब खुद पेंटागन के अधिकारी चिंता में हैं कि इस रफ्तार से मिसाइलें खत्म हो जाएंगी और दोबारा बनाने में लगेंगे दो-दो साल।
वाशिंगटन से एक ऐसी खबर आई है जिसने अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। अमेरिका ने ईरान के साथ अपनी जंग में महज चार हफ्तों के भीतर 850 से ज्यादा टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइलें दाग दी हैं। और अब पेंटागन के भीतर ही अफरातफरी मची हुई है — क्योंकि इन मिसाइलों का भंडार तेज़ी से खाली हो रहा है।
अमेरिकी अखबार द वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक पेंटागन के कई वरिष्ठ अधिकारी इस स्थिति को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं। एक अधिकारी ने तो साफ कह दिया कि मध्य-पूर्व में टॉमहॉक मिसाइलों की संख्या अब “खतरनाक रूप से कम” हो चुकी है। एक अन्य अधिकारी ने चेतावनी दी कि अगर इसी रफ्तार से मिसाइलें खर्च होती रहीं और कोई इंतजाम नहीं किया गया, तो जल्द ही उस इलाके में इनका पूरी तरह टोटा पड़ सकता है।
एक मिसाइल, एक कार से भी महंगी नहीं — बल्कि एक घर से भी!
टॉमहॉक मिसाइल कोई सस्ता खिलौना नहीं है। एक टॉमहॉक की कीमत करीब 3.6 मिलियन डॉलर यानी लगभग 30 करोड़ रुपये होती है। और सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसे बनाने में दो साल तक का वक्त लग सकता है। ज़रा सोचिए — जो मिसाइल महीने भर में दागी जा रही है, उसे फिर से तैयार करने में दो साल!
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इतना ही नहीं, पिछले साल के अमेरिकी रक्षा बजट में केवल 57 टॉमहॉक मिसाइलें ही खरीद के लिए मंज़ूर की गई थीं। यानी पिछले साल का पूरा सालाना ऑर्डर तो अमेरिका ने शायद एक ही दिन में खर्च कर दिया होगा।
हर साल कितनी बनती हैं?
टॉमहॉक मिसाइलों का उत्पादन हर साल कुछ सौ के आसपास ही होता है। रेथियॉन कंपनी इन्हें बनाती है, लेकिन उत्पादन की रफ्तार और मांग के बीच अब एक बड़ी खाई बन गई है। पेंटागन में इस वक्त इस बात पर बहस चल रही है कि क्या दुनिया के दूसरे हिस्सों में तैनात मिसाइलों को मध्य-पूर्व भेजा जाए, या फिर उत्पादन तुरंत बढ़ाया जाए।
लेकिन दोनों ही रास्ते आसान नहीं हैं। दूसरे इलाकों से मिसाइलें हटाने का मतलब है कि वहाँ सुरक्षा कमज़ोर पड़ जाएगी — और उत्पादन बढ़ाने में वक्त लगेगा, जो फिलहाल है नहीं।

भारत के लिए क्या मायने रखती है यह खबर?
यह खबर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से पूरा करता है। अगर यह युद्ध लंबा खिंचा और होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण रास्ते प्रभावित हुए, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। पेट्रोल-डीज़ल से लेकर रसोई गैस तक — हर चीज़ महंगी हो सकती है। आम भारतीय की जेब पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल अमेरिकी अधिकारी यह तय नहीं कर पा रहे कि अगला कदम क्या होगा। एक तरफ ईरान के साथ टकराव जारी है, दूसरी तरफ अपना खुद का शस्त्र भंडार सिकुड़ता जा रहा है। टॉमहॉक जैसी मिसाइलें अमेरिका की लंबी दूरी की मारक क्षमता की रीढ़ मानी जाती हैं — और अगर यह रीढ़ कमज़ोर पड़ गई तो अमेरिका की ताकत का वह रुतबा जो दशकों में बना है, वह हिल सकता है।
जंग महंगी होती है — यह बात हमेशा से कही जाती रही है। लेकिन 850 टॉमहॉक मिसाइलों की यह कहानी बताती है कि सबसे ताकतवर देश भी असीमित नहीं होता।
