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सुना आपने? “Shubman Gill को हर फॉर्मेट का कप्तान बनाना चाहिए”—सौरव गांगुली का बड़ा बयान फिर कहा, ‘3 महीने पहले तो वह सोना लग रहा था’
दादा ने कहा—गिल की कप्तानी पर सवाल उठाना जल्दबाज़ी है, तीन महीने में जो हीरो था, उसे अब कसौटी पर कसना भारतीय क्रिकेट की अधीरता दिखाता है
टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने शुबमन गिल के समर्थन में एक बार फिर अपनी “दादागिरी” दिखा दी है। Bandhan Bank’s The Captain’s Calm पॉडकास्ट में गांगुली ने न सिर्फ गिल का बचाव किया, बल्कि यह तक कह दिया कि गिल को “हर फॉर्मेट का कप्तान” बनाना चाहिए। उनका कहना था कि जो खिलाड़ी तीन महीने पहले इंग्लैंड में कप्तान के रूप में “सोने” की तरह चमक रहा था, उसी पर अब सवाल उठाना भारत की क्रिकेट संस्कृति की अधीरता दर्शाता है।
गांगुली ने बताया कि हाल ही में Eden Gardens में बैठे हुए किसी ने उनसे पूछा—क्या गिल टी20I के लिए सही कप्तान हैं? दादा ने तुरंत कहा—
“वह इतना अच्छा है कि उसे सबका कप्तान होना चाहिए।”
उन्होंने याद दिलाया कि कुछ ही समय पहले गिल इंग्लैंड में एक युवा टीम की अगुवाई कर रहे थे, जहाँ न विराट कोहली थे, न रोहित शर्मा—और गिल की बैटिंग व नेतृत्व क्षमता दोनों ने सबको प्रभावित किया था।

गांगुली का ‘कप्तान ऑफ एवरीथिंग’ बयान असल में एक चेतावनी
गांगुली ने अपने बयान को एक बड़े मुद्दे से जोड़ा—इंडियन क्रिकेट में धैर्य की कमी।
उनके शब्द थे:
“तीन महीने पहले वही लड़का इंग्लैंड में सोना लग रहा था—बैटिंग, कप्तानी, सब कुछ। और आज, तीन महीने में ही आप सवाल पूछ रहे हैं। यह लोगों की मानसिकता है। जो फैसले लेते हैं, उन्हें समय देना चाहिए। अगर हर हफ्ते, हर महीने उन पर सवाल उठेंगे, तो वे कैसे बेहतर बनेंगे?”
दादा साफ चेतावनी दे रहे थे कि अगर भारत हर नए कप्तान या खिलाड़ी को सिर्फ 2–3 महीने की विंडो में परखता रहेगा, तो कोई भी नेता ग्रो नहीं कर पाएगा।
गांगुली ने कहा कि कप्तान को सीखने का समय देना जरूरी है—गलतियाँ होंगी, लेकिन वही गलतियाँ उसे बेहतर बनाएँगी।
गांगुली के नेतृत्व दर्शन की झलक
सौरव गांगुली ने अपने वक्तव्य में यह भी बताया कि जब वे भारतीय टीम का नेतृत्व कर रहे थे, तब उनकी सोच क्या थी:
- खिलाड़ियों को फेल होने का डर नहीं देना
- चयन इस मानसिकता से करना कि खिलाड़ी सफल हो, असफल नहीं
- बुरे दिनों को अच्छे दिनों की कीमत समझना
उनका मानना है कि कप्तान को हर हफ्ते, हर सीरीज़ में कसौटी पर कसने की यह प्रवृत्ति न सिर्फ खिलाड़ियों पर दबाव डालती है बल्कि टीम की स्थिरता को भी नुकसान पहुंचाती है।
गिल पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
बीते कुछ महीनों में टीम की प्रदर्शन संबंधी असंगतताओं ने गिल की नेतृत्व क्षमता को लेकर चर्चाएँ बढ़ाई हैं।
लेकिन गांगुली के मुताबिक:
- नेतृत्व एक यात्रा है, मंज़िल नहीं
- एक युवा कप्तान से तुरंत चमत्कार की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए
- जो खिलाड़ी टेस्ट, ODI और T20—सभी में सामर्थ्य दिखा सकता है, उसे अधिक समय और विश्वास मिलना चाहिए
गांगुली बार-बार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भारतीय क्रिकेट को “रिएक्टिव मोड” छोड़कर “लॉन्ग-टर्म बिल्डिंग” अपनानी होगी।

चंद महीनों में नायक से संदिग्ध—दादा को क्यों चुभा यह बदलाव?
गांगुली द्वारा खींची गई तस्वीर बड़ी सरल है:
- एक तिमाही पहले: शुबमन गिल इंग्लैंड में युवा टीम के कप्तान के रूप में चमके
- एक तिमाही बाद: वही लोग उनके नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं
दादा मानते हैं कि यह परिवर्तन सिर्फ अनुचित नहीं बल्कि हानिकारक है।
किसी भी कप्तान को निरंतरता और समय की जरूरत होती है—क्योंकि नेतृत्व परिपक्वता से आता है, जल्दीबाजी से नहीं।
दादा का संदेश स्पष्ट है: भरोसा रखिए, नेता तैयार कीज़िए
भारत ने बीते वर्षों में कई नेतृत्व परिवर्तन देखे हैं, और इससे टीम का संतुलन भी प्रभावित हुआ है।
गांगुली का कहना है कि:
- युवा कप्तान को समय दें
- गलतियाँ होने दें
- और सीखने का अवसर छोड़ें
क्योंकि एक स्थिर कप्तान ही लंबे समय में टीम को स्थिरता दे सकता है।
