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चीन की निगरानी तकनीक के साये में नेपाल, क्या बन रहा है एक नई ‘डिजिटल जेल’?
कैमरों और सर्विलांस सिस्टम के बढ़ते जाल से तिब्बती समुदाय में डर, आज़ादी पर सवाल
नेपाल को लंबे समय से शरण और स्वतंत्रता की भूमि के रूप में देखा जाता रहा है, खासकर तिब्बती शरणार्थियों के लिए। लेकिन हाल के वर्षों में हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। चीन की निगरानी तकनीक के बढ़ते प्रभाव के चलते नेपाल पर यह आरोप लगने लगे हैं कि वह धीरे-धीरे एक तरह की “डिजिटल जेल” में तब्दील होता जा रहा है।
काठमांडू और चीन से सटे सीमावर्ती इलाकों में हजारों सीसीटीवी कैमरे, हाई-टेक निगरानी टावर और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लगाए जा चुके हैं। आधिकारिक तौर पर इन्हें सुरक्षा और अपराध नियंत्रण के लिए जरूरी बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
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तिब्बती शरणार्थियों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इन निगरानी उपकरणों का सबसे ज्यादा असर तिब्बती समुदाय की गतिविधियों पर पड़ रहा है। उनकी रोजमर्रा की आवाजाही, आपसी बैठकों और यहां तक कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर भी नजर रखी जा रही है।
इस व्यापक निगरानी का सीधा असर ‘फ्री तिब्बत’ जैसे आंदोलनों पर पड़ा है। पहले जहां तिब्बती समुदाय अपनी आवाज खुलकर उठा पाता था, अब वहां डर और असुरक्षा का माहौल बन गया है। कई लोगों का कहना है कि वे बोलने से पहले कई बार सोचने को मजबूर हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन और नेपाल के बीच बढ़ते राजनीतिक और आर्थिक रिश्तों का असर अब नागरिक स्वतंत्रताओं पर भी दिखने लगा है। डिजिटल निगरानी तकनीक सिर्फ अपराध रोकने का जरिया नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक नियंत्रण का साधन बनती जा रही है।
नेपाल सरकार की ओर से इन आरोपों पर कोई सख्त प्रतिक्रिया नहीं आई है। सरकार का कहना है कि सभी कदम देश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सुरक्षा के नाम पर आजादी की कीमत चुकाई जा रही है?
यह मुद्दा सिर्फ तकनीक का नहीं, बल्कि मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों का भी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि नेपाल इस संतुलन को कैसे साधता है।
